बुधवार, 4 नवंबर 2020

मूषक कैसे बने गणेश जी का सवारी

”कैसे बना मूषक भगवान गणेश की सवारी“
भगवान गणेश का चूहा पूर्व जन्म में एक गंधर्व था, जिसका नाम क्रोंच था। एक बार देवराज इंद्र की सभा में गलती से क्रोंच का पैर मुनि वामदेव के ऊपर पड़ गया। मुनि वामदेव को लगा कि क्रोंच ने उनके साथ शरारत की है इसीलिए रूष्ठ होकर उन्होंने उसे चूहा बनने का श्राप दे दिया। उस श्राप के कारण क्रांेच एक चूहा बन चुका था, लेकिन विशालकाय था। एक बार वो महर्षि पराशर के आश्रम में पहुंच गया। वहां पहुंचकर उसने मिट्टी के सभी पात्र तोड़ डाले और उत्पात मचाने लगा। 
उस वक्त महर्षि पराशर के आश्रम में भगवान गणेश भी मौजूद थे। गणेश जी ने उस मूषक को सबक सिखाने के लिए अपना अस्त्र फेंका। अस्त्र को अपनी तरफ बढ़ते हुए देख मूषक पाताल लोक पहुंच गया। अस्त्र की पकड़ से मूषक बेहोश हो गया, जैसे ही उसे होश आया उसने खुद को भगवान गणेश के सामने पाया। बिना देरी किए मूषक गणेश जी से अपने प्राणों की भीख मांगने लगा। गणेश जी मूषक की अराधना से खुश हो गए और कहा कि तुमने आश्रम में महर्षि पराशर का ध्यान भंग किया है। मूषक चुपचाप खड़ा रहा और कुछ नहीं बोला, फिर गणेश जी ने कहा कि शरणागत की रक्षा भी मेरा परम धर्म है इसलिए जो चाहो वरदान मांग लो। ये सुनकर मूषक अंहकार से भर उठा और भगवान गणेश से बोला कि यदि आप चाहें, तो मुझसे वर की याचना कर सकते हैं। 
मूषक की गर्व भरी वाणी सुनकर गणेश जी मन ही मन मुस्कुराए और कहा कि यदि तेरा वचन सत्य है, तो तू मेरा वाहन बन जा। मूषक ने बिना देरी किए तथास्तु बोल दिया। वहीं भारी भरकम गजानन के भार से दबकर मूषक के प्राण संकट में आ गए। तब उसने गजानन से प्रार्थना की कि वो अपना भार उसके वहन करने योग्य बना लें। इस तरह मूषक का गर्व चूर चूर कर गणेश जी ने उसे अपना वाहन बना लिया। 

गणेश जी का चूहे पर बैठना इस बात का संकेत है कि उन्होंने स्वार्थ पर विजय पाई है और जनकल्याण के भाव को अपने भीतर जागृत किया है।

आप का तिवारी परिवार 

ब्रामणो से डरते थे अंग्रज जाने क्यूँ

गुलामी के दिन थे। प्रयाग में कुम्भ मेला चल रहा था। एक अंग्रेज़ अपने द्विभाषिये के साथ वहाँ आया। गंगा के किनारे एकत्रित अपार जन समूह को देख अंग्रेज़ चकरा गया। 

उसने द्विभाषिये से पूछा, "इतने लोग यहाँ क्यों इकट्टा हुए हैं?"
 
द्विभाषिया बोला, "गंगा स्नान के लिये आये हैं सर।" 

अंग्रेज़ बोला, "गंगा तो यहां रोज ही बहती है फिर आज ही इतनी भीड़ क्यों इकट्ठा है?" 

द्विभाषीया: - "सर आज इनका कोई मुख्य स्नान पर्व होगा।" 
अंग्रेज़ :- " पता करो कौन सा पर्व है ?" 

द्विभाषिये ने एक आदमी से पूछा तो पता चला कि आज बसंत पंचमी है।

अंग्रेज़:-  "इतने सारे लोगों को एक साथ कैसे मालूम हुआ कि आज ही बसंत पंचमी है?"

द्विभाषिये ने जब लोगों से पुनः इस बारे में पूछा तो एक ने जेब से एक जंत्री निकाल कर दिया और बोला इसमें हमारे सभी तिथि त्योहारों की जानकारी है। 

अंग्रेज़ अपनी आगे की यात्रा स्थगित कर जंत्री लिखने वाले के घर पहुँचा। एक दड़बानुमा अंधेरा कमरा, कंधे पर लाल फटा हुआ गमछा, खुली पीठ, मैली कुचैली धोती पहने एक व्यक्ति दीपक की मद्धिम रोशनी में कुछ लिख रहा था। पूछने पर पता चला कि वो एक गरीब ब्राह्मण था जो जंत्री और पंचांग लिखकर परिवार का पेट भरता था। 

अंग्रेज़ ने अपने वायसराय को अगले ही क्षण एक पत्र लिखा :- "इंडिया पर सदा के लिए शासन करना है तो सर्वप्रथम ब्राह्मणों का समूल विनाश करना होगा सर क्योंकि जब एक दरिद्र और भूँख से जर्जर ब्राह्मण इतनी क्षमता रखता है कि दो चार लाख लोगों को कभी भी इकट्टा कर सकता है तो सक्षम ब्राह्मण क्या कर सकते हैं, गहराई से विचार कीजिये सर।" 
🙏
🙏🙏🙏🙏
और आप गहराई से बिचार 
आप का तिवारी परिवार 
जय श्री राम 

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

भगवान के भगत के आगे झुकें भगवान

लड्डू गोपाल 
एक नगर में दो वृद्ध स्त्रियाँ बिल्कुल पास-पास रहा करती थीं। उन दोनों में बहुत ज़्यादा घनिष्ठता थी। उन दोनो का ही संसार में कोई नहीं था इसलिए एक दूसरे का सदा साथ देतीं और अपने सुख-दुःख आपस में बाँट लेती थीं। एक स्त्री हिन्दू थी तथा दूसरी जैन धर्म को मानने वाली थी।
हिन्दू वृद्धा ने अपने घर में लड्डू गोपाल को विराजमान किया हुआ था। वह प्रतिदिन बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा करा करती थी। प्रतिदिन उनको स्नान कराना, धुले वस्त्र पहनाना, दूध व फल आदि भोग अर्पित करना उसका नियम था। वह स्त्री लड्डू गोपाल के भोजन का भी विशेष ध्यान रखती थी। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम का ध्यान उसको रहता था। वह जब भी कभी बाहर जाती लड्डू गोपाल के लिए कोई ना कोई खाने की वस्तु, नए वस्त्र खिलोने आदि अवश्य लाती थी। लड्डू गोपाल के प्रति उसके मन में आपार प्रेम और श्रद्धा का भाव था।

उधर जैन वृद्धा भी अपनी जैन परम्परा के अनुसार भगवान् के प्रति सेवा भाव में लगी रहती थी। उन दोनो स्त्रियों के मध्य परस्पर बहुत प्रेम भाव था। दोनो ही एक दूसरे के भक्ति भाव और धर्म की प्रति पूर्ण सम्मान की भावना रखती थी। जब किसी को कोई समस्या होती तो दूसरी उसका साथ देती, दोनो ही वृद्धाएँ स्वभाव से भी बहुत सरल और सज्जन थीं। भगवान की सेवा के अतिरिक्त उनका जो भी समय शेष होता था वह दोनो एक दूसरे के साथ ही व्यतीत करती थीं।

एक बार हिन्दू वृद्धा को एक माह के लिए तीर्थ यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ उसने दूसरी स्त्री से भी साथ चलने का आग्रह किया किन्तु वृद्धावस्था के कारण अधिक ना चल पाने के कारण उस स्त्री ने अपनी विवशता प्रकट कर दी। हिन्दु वृद्धा ने कहा कोई बात नहीं मैं जहाँ भी जाऊँगी भगवान् से तुम्हारे लिए प्रार्थना करुँगी फिर वह बोली मैं तो एक माह के लिए चली जाऊँगी तब तक मेरे पीछे मेरे लड्डू गोपाल का ध्यान रखना। उस जैन वृद्धा ने सहर्ष ही उसका यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। हिन्दू वृद्धा ने उस जैन वृद्धा को लड्डू गोपाल की सेवा के सभी ज़रूरी नियम व आवश्यकताएँ बता दीं। उस जैन वृद्धा ने सहर्ष सब कुछ स्वीकार कर लिया।

कुछ दिन बाद वह हिन्दू वृद्धा तीर्थ यात्रा के लिए निकल गई। उसके जाने के बाद लड्डू गोपाल की सेवा का कार्य जैन वृद्धा ने अपने हाथ में लिया। वह बहुत उत्त्साहित थी कि उसको लड्डू गोपाल की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ। उस दिन उसने बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा की। भोजन कराने से लेकर रात्रि में उनके शयन तक के सभी कार्य पूर्ण श्रद्धा के साथ वैसे ही पूर्ण किए जैसे उसको बताए गए थे। लड्डू गोपाल के शयन का प्रबन्ध करके वह भी अपने घर शयन के लिए चली गई।

अगले दिन प्रातः जब वह वृद्धा लड्डू गोपाल की सेवा के लिए हिन्दू स्त्री के घर पहुँची तो उसने सबसे पहले लड्डू गोपाल को स्नान कराने की तैयारी की। नियम के अनुरूप जब वह लड्डू गोपाल को स्नान कराने लगी तो उसने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और मुड़े हुए हैं। उसने पहले कभी लड्डू गोपाल के पाँव नहीं देखे थे, जब भी उनको देखा वस्त्रों में ही देखा था। वह नहीं जानती थी कि लड्डू गोपाल के पाँव हैं ही ऐसे, घुटनों के बल बैठे हुए। लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की ओर देख कर वह सोचने लगी अरे मेरे लड्डू गोपाल को यह क्या हो गया इसके तो पैर मुड़ गए है। उसने उस हिन्दू वृद्धा से सुन रखा था की लड्डू गोपाल जीवंत होते हैं। उसने मन में विचार किया कि मैं इनके पैरो की मालिश करुँगी हो सकता है इनके पाँव ठीक हो जायें। बस फिर क्या था भक्ति भाव में डूबी उस भोली भाली वृद्धा ने लड्डू गोपाल के पैरों की मालिश आरम्भ कर दी। उसके बाद वह नियम से प्रतिदिन पांच बार उनके पैरों की मालिश करने लगी। उस भोली वृद्धा की भक्ति और प्रेम देख कर

ठाकुर जी का हृदय द्रवित हो उठा। भक्त वत्सल भगवान् अपनी करुणावश अपना प्रेम उस वृद्धा पर उड़ेल दिया । एक दिन प्रातः उस जैन वृद्धा ने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव ठीक हो गए हैं और वह सीधे खड़े हो गए हैं, यह देख कर वह बहुत प्रसन्न हुई और दूसरी स्त्री के आने की प्रतीक्षा करने लगी। कुछ दिन पश्चात् दूसरी स्त्री वापस लौटी तो उसने घर आकर सबसे पहले अपने लड्डू गोपाल के दर्शन किये किन्तु जैसे ही वह लड्डू गोपाल के सम्मुख पहुँची तो देखा कि वह तो अपने पैरों पर सीधे खड़े हैं। यह देखकर वह अचंभित रह गई।वह तुरन्त उस दूसरी स्त्री के पास गई और उसको सारी बात बताई और पूछा कि मेरे लड्डू गोपाल कहां गए ? यह सुनकर उस जैन स्त्री ने सारी बात बता दी।

उसकी बात सुनकर वह वृद्ध स्त्री सन्न रह गई और उसको लेकर अपने घर गई। वहाँ जाकर उसने देखा तो लड्डू गोपाल मुस्करा रहे थे। वह लड्डू गोपाल के चरणों में गिर पड़ी और बोली - हे गोपाल! आपकी लीला निराली है। मैंने इतने वर्षो तक आपकी सेवा की किन्तु आपको नहीं पहचान सकी । फिर उस जैन वृद्धा से बोली कि, तू धन्य है! तुझको नहीं मालूम कि हमारे लड्डू गोपाल के पाँव तो ऐसे ही हैं, पीछे की ओर किन्तु तेरी भक्ति और प्रेम ने तो लड्डू गोपाल के पाँव भी सीधे कर दिये।

उस दिन के बाद उन दोनो स्त्रियों के मध्य प्रेम भाव और अधिक बढ़ गया। दोनों मिलकर लड्डू गोपाल की सेवा करने लगीं। वह दोनो स्त्रियां जब तक जीवित रहीं तब तक लड्डू गोपाल की नियमित सेवा करती रहीं।

🌹 जय श्री वृंदावन बिहारी लाल की !🌹

🌷जय श्री लड्डू गोपाल जी।🌷

🌷जय श्री राधे राधे।🌷 
आप का तिवारी परिवार 

शनिवार, 12 सितंबर 2020

हमारी सारी पुन्ने नष्ट तब हो जाता जब हम पाप देखते रहते है

प्रसंग (बोध कथा)

 श्री कृष्ण महाभारत के युद्ध पश्चात् लौटे तो रोष में भरी रुक्मिणी ने उनसे पूछा ?
 " बाकी सब तो ठीक था किंतु आपने द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जैसे धर्मपरायण लोगों के वध में क्यों साथ दिया ?"
.
श्री कृष्ण ने उत्तर दिया -
"ये सही है की उन दोनों ने जीवन पर्यंत धर्म का पालन किया किन्तु उनके किये एक पाप ने उनके सारे पुण्यों को हर लिया "

    *"वो कौनसे पाप थे?"*

श्री कृष्ण ने कहा :
 "जब भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था तब ये दोनों भी वहां उपस्थित थे,और बड़े होने के नाते ये दुशासन को आज्ञा भी दे सकते थे किंतु इन्होंने ऐसा नहीं किया

    *उनका इस एक पाप से बाकी,*
  *सारी धर्मनिष्ठता छोटी पड गई"*
.
रुक्मिणी ने पुछा -
"और कर्ण? 
वो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था,कोई उसके द्वार से खाली हाथ नहीं गया उसकी क्या गलती थी?"

श्री कृष्ण ने कहा, "वस्तुतः वो अपनी दानवीरता के लिए विख्यात था और उसने कभी किसी को ना नहीं कहा,

 किन्तु जब अभिमन्यु सभी युद्धवीरों को धूल चटाने के बाद युद्धक्षेत्र में आहत हुआ भूमि पर पड़ा था तो उसने कर्ण से,जो उसके पास खड़ा था,पानी माँगा,कर्ण जहाँ खड़ा था उसके पास पानी का एक गड्ढा था किंतु कर्ण ने मरते हुए अभिमन्यु को पानी नहीं दिया।

इसलिये उसका जीवन भर दानवीरता से कमाया हुआ पुण्य नष्ट हो गया। बाद में उसी गड्ढे में उसके रथ का पहिया फंस गया और वो मारा गया" 

प्रायः ऐसा होता है की हमारे आसपास कुछ गलत हो रहा होता है और हम कुछ नहीं करते । हम सोचते हैं की इस पाप के भागी हम नहीं हैं किंतु मदद करने की स्थिति में होते हुए भी कुछ ना करने से हम उस पाप के उतने ही हिस्सेदार हो जाते हैं ।
.
किसी स्त्री, बुजुर्ग, निर्दोष,कमज़ोर या बच्चे पर अत्याचार होते देखना और कुछ ना करना हमें पाप का भागी बनाता है। सड़क पर दुर्घटना में घायल हुए व्यक्ति को लोग नहीं उठाते हैं क्योंकि वो समझते है की वो पुलिस के चक्कर में फंस जाएंगे|

*आपके अधर्म का एक क्षण सारे जीवन के कमाये धर्म को नष्ट कर सकता है।*।

🌹🙏मंगल सुप्रभात🙏🌹

🌹🙏जय जय श्री राधे🙏🌹

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आप का तिवारी परिवार जय श्री राधे राधे 

शनिवार, 29 अगस्त 2020

हमारी संस्कृति पर शीधा प्रहार कर रहे हैं बामपंथी और मिशनरियों के धोवारा

किसी निष्कर्ष पर पहुचने से पहले पूरा पढ़ें...

#वेशभूषा" और "#पहनावे" से कुछ नहीं होता!
एक दिन मोहल्ले में किसी ख़ास अवसर पर महिला सभा का आयोजन किया गया, सभा स्थल पर महिलाओं की संख्या अधिक और पुरुषों की कम थी। मंच पर तकरीबन पच्चीस वर्षीय खुबसूरत युवती, आधुनिक वस्त्रों से सुसज्जित, माइक थामें कोस रही थी पुरुष समाज को।

वही पुराना आलाप.... कम और छोटे कपड़ों को जायज, और कुछ भी पहनने की स्वतंत्रता का बचाव करते हुए, पुरुषों की गन्दी सोच और खोटी नीयत का दोष बतला रही थी।

तभी अचानक सभा स्थल से... तीस बत्तीस वर्षीय सभ्य, शालीन और आकर्षक से दिखते नवयुवक ने खड़े होकर अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति मांगी। अनुमति स्वीकार कर अनुरोध माइक उसके हाथों मे सौप दिया गया .... हाथों में माइक आते ही उसने बोलना  शुरु किया....

"माताओं, बहनों और भाइयों, मैं आप सबको नही जानता और आप सभी मुझे नहीं जानते कि आखिर मैं कैसा इंसान हूं? लेकिन पहनावे और शक्ल सूरत से मैं आपको कैसा लगता हूँ बदमाश या शरीफ?"

सभास्थल से कई आवाजें गूंज उठीं... पहनावे और बातचीत से तो आप शरीफ लग रहे हो... शरीफ लग रहे हो... शरीफ लग रहे हो....

बस यहि सुनकर, अचानक ही उसने अजीबोगरीब हरकत कर डाली... सिर्फ हाफ पैंट टाइप की अपनी  अंडरवियर छोड़ कर के बांकि सारे कपड़े मंच पर ही उतार दिये। ये देख कर .... पूरा सभा स्थल आक्रोश से गूंज उठा, मारो मारो गुंडा है, बदमाश है, बेशर्म है, शर्म नाम की चीज नहीं है इसमें.... मां बहन का लिहाज नहीं है इसको, नीच इंसान है, ये छोड़ना मत इसको....

ये आक्रोशित शोर सुनकर... अचानक वो माइक पर गरज उठा... 

"रुको... पहले मेरी बात सुन लो, फिर मार भी लेना चाहे तो जिंदा जला भी देना मुझको। अभी अभी तो....ये बहन जी कम कपड़े , तंग और बदन नुमाया छोटे छोटे कपड़ों की पक्ष के साथ साथ स्वतंत्रता की दुहाई देकर गुहार लगाकर...

"नीयत और सोच में खोट" बतला रही थी... तब तो आप सभी तालियां बजा-बजाकर सहमति जतला रहे थे। फिर मैंने क्या किया है? सिर्फ कपड़ों की स्वतंत्रता ही तो दिखलायी है।
"नीयत और सोच" की खोट तो नहीं ना और फिर मैने तो, आप लोगों को... मां बहन और भाई भी कहकर ही संबोधित किया था। फिर मेरे अर्द्ध नग्न होते ही.... आप में से किसी को भी मुझमें "भाई और बेटा" क्यों नहीं नजर आया?? मेरी नीयत में आप लोगों को खोट कैसे नजर आ गया? मुझमें आपको सिर्फ "मर्द" ही क्यों नजर आया? भाई, बेटा, दोस्त क्यों नहीं नजर आया? आप में से तो किसी की "सोच और नीयत" भी खोटी नहीं थी... फिर ऐसा क्यों?? "

सच तो यही है कि..... झूठ बोलते हैं लोग कि... 
"वेशभूषा" और "पहनावे" से कोई फर्क नहीं पड़ता

हकीकत तो यही है कि मानवीय स्वभाव है कि किसी को सरेआम बिना "आवरण" के देखे लें तो कामुकता जागती है मन में...
रूप, रस, शब्द, गन्ध, स्पर्श ये बहुत प्रभावशाली कारक हैं  इनके प्रभाव से विस्वामित्र जैसे मुनि के मस्तिष्क में विकार पैदा हो गया था। जबकि उन्हें सिर्फ रूप कारक के दर्शन किये! आम मनुष्यों की विसात कहाँ।

दुर्गा शप्तशती के देव्या कवच में श्लोक 38 में भगवती से इन्हीं कारकों से रक्षा करने की प्रार्थना की गई।
#रसे_रुपे_च_गन्धे_च_शब्दे_स्पर्शे_च_योगिनी।
#सत्त्वं_रजस्तमश्चैव_रक्षेन्नारायणी_सदा।।
रस रूप गंध शब्द स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करें तथा सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें।

अब बताइए, हम भारतीय हिन्दु महिलाओं को "हिन्दु संस्कार" में रहने को समझाएं तो स्त्रियों की कौन-सी "स्वतंत्रता" छीन रहे हैं???

संभालिए अपने आप और समाज को, क्योंकि भारतीय समाज और संस्कृति का आधार नारीशक्ति है और धर्म विरोधी, अधर्मी, चांडाल (बॉलीवुड, वामपंथी, इसे मिशनरी) ये हमारे समाज के आधार को तोड़ने का षड्यंत्र कर रहे हैं 🙏🙏🙏 
आप का तिवारी परिवारा 
जय श्री राधे राधे 
धन्यवाद 

रविवार, 9 अगस्त 2020

असकंद पुराण का एक इस्लोक ने वैज्ञानिक को चैलेंज करता है जो आज तर्क हितकर करते हैं

मैं जो कहने जा रही  हूँ इसको ज़रा ध्यान से पढ़ियेगा। विश्वास है आप प्रभावित अवश्य होंगे। 
ऋग्वेद में एक श्लोक है जिसपर व्याख्या करते हुए कहा गया है : 
"तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धे- न क्रममाण नमोऽस्तुते- ॥"
अर्थात "हे सूर्यदेव, आप आधे निमेष में 2,202 योजन की यात्रा करते हैं, आपको नमन।"
2,202 योजन 3,18,94,042.81 मीटर के बराबर होता है। 
एक निमेष 16/75 सेकण्ड के बराबर होता है। 
इस श्लोक के अनुसार सूर्य के प्रकाश की गति निकलती है 2.9907 X 10^8 मीटर प्रति सेकण्ड। 
हमारे आधुनिक वैज्ञानिकों ने प्रकाश की गति निकली है जो है 2.9979 X 10^8 मीटर प्रति सेकण्ड। 
3500 साल पहले भारत के वैज्ञानिक प्रकाश की गति खोज चुके थे और यह सब हमारे ग्रंथों में अभिलिखित है। भारत की ज्ञाननिधि असीम है और इसे अभिलिखित किया गया था विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा में - संस्कृत में। 
क्या हमें संस्कृत सीखनी चाहिए? यदि भारत की महानता एक खजाना है तो उसकी चाबी संस्कृत है। हमारे ऊपर हमारे महान पूर्वजों और आने वाली पीढ़ियों का ऋण है कि हम संस्कृत सीखें और सिखाएं।
धन्यवाद आप का तिवारी परिवार जय श्री राधे राधे 

बुधवार, 22 जुलाई 2020

बिजली बिभाग कुछ इस तरह का भाव है

बिजली विभाग के दफ्तर के बाहर राजू केले बेच रहा था।

बिजली विभाग के एक बड़े अधिकारी ने पूछा : " केले कैसे दिए" ?

राजू: केले किस लिए खरीद रहे हैं साहब ?

अधिकारी:- मतलब ?? 

राजू:- मतलब ये साहब कि,
मंदिर के प्रसाद के लिए ले रहे हैं तो 10 रुपए दर्जन। 
वृद्धाश्रम में देने हों तो 15 रुपए दर्जन। 
बच्चों के टिफिन में रखने हों तो 20 रुपए दर्जन। 
घर में खाने के लिए ले जा रहे हों तो, 25 रुपए दर्जन 
और अगर  पिकनिक के लिए खरीद रहे हों तो 30 रुपए दर्जन।

अधिकारी: - ये क्या बेवकूफी है ? अरे भई, जब सारे केले एक जैसे ही हैं तो,भाव अलग अलग क्यों बता रहे हो ?

राजू: - ये तो पैसे वसूली का, आप ही का स्टाइल है साहब। 
1 से 100 रीडिंग का रेट अलग, 
100 से 200 का अलग, 
200 से 300 का अलग। 

अरे आपके बाप की बिजली है क्या ?

आप भी तो एक ही खंभे से बिजली देते हो। 

तो फिर घर के लिए अलग रेट, 
दूकान के लिए अलग रेट, 
कारखाने के लिए अलग रेट, 

फिर इंधन भार, विज आकार.....

और हाँ, एक बात और साहब, 
मीटर का भाड़ा।

मीटर क्या अमेरिका से आयात किया है ? 25 सालों से उसका भाड़ा भर रहा हूँ। आखिर उसकी कीमत है कितनी ?? आप ये तो बता दो मुझे एक बार।

जागो ग्राहक जागो
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बुधवार, 27 मई 2020

भगवान् पसूपती नाथ की कुछ महिमा

🐍🔱#जय_पशुपतिनाथ_महादेव।🔱🐍
          **पौराणिक कथा**
🎱1. एक पौराणिक कथा के अनुसार #भगवान #शिव यहां पर #चिंकारे का #रूप धारण कर #निद्रा में चले बैठे थे। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहा जाता हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया था। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में यहां प्रकट हुए थे।

 🎱2.दूसरी कथा एक चरवाहे से जुड़ी है। कहते हैं कि इस शिवलिंग को एक चरवाहे द्वारा खोजा गया था जिसकी गाय का अपने दूध से अभिषेक कर शिवलिंग के स्थान का पता लगाया था।
 
🎱 3.तीसरी कथा भारत के उत्तराखंड राज्य से जुडी एक पौराणिक कथा से है। इस कथा के अनुसार इस मंदिर का संबंध केदारनाथ मंदिर से है। कहा जाता है जब पांडवों को स्वर्गप्रयाण के समय शिवजी ने भैंसे के स्वरूप में दर्शन दिए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन पूर्णतः समाने से पूर्व भीम ने उनकी पुंछ पकड़ ली थी। जिस स्थान पर भीम ने इस कार्य को किया था उसे वर्तमान में केदारनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। एवं जिस स्थान पर उनका मुख धरती से बाहर आया उसे पशुपतिनाथ कहा जाता है। पुराणों में पंचकेदार की कथा नाम से इस कथा का विस्तार से उल्लेख मिलता है।

शुक्रवार, 8 मई 2020

राजा जनक के बाद मिथिला का उत्तर अधिकारी के नाम इस प्रकार है

रामायण काल तक के विदेह (जनक) वंशीय राजाओं के नाम वाल्मीकीय रामायण में स्पष्टतया उल्लिखित रहने के कारण पुराणों की अपेक्षा वे नाम ही स्वीकार्य हैं, परन्तु सीरध्वज जनक के बाद के राजाओं के नाम स्वाभाविक रूप से वाल्मीकीय रामायण में न होने के कारण पुराणों का सहारा लेना पड़ता है। इनमें सर्वाधिक प्राचीन पुराणों में से एक तथा अपेक्षाकृत सुसंगत श्रीविष्णुपुराण का आधार अधिक उपयुक्त है। सीरध्वज के पुत्र भानुमान् से लेकर कृति (अन्तिम) तक कुल 32 राजाओं के नाम श्रीविष्णुपुराण[4] में दिये गये हैं और उन्हें स्पष्ट रूप से 'मैथिल' (इत्येते मैथिला:) कहा गया है।

1.भानुमान्

2.शतद्युम्न

3.शुचि

4.ऊर्जनामा

5.शतध्वज

6.कृति

7.अंजन

8.कुरुजित्

9.अरिष्टनेमि

10.श्रुतायु

11.सुपार्श्व

12.सृंजय

13.क्षेमावी

14.अनेना

15.भौमरथ

16.सत्यरथ

17.उपगु

18.उपगुप्त

19.स्वागत

20.स्वानन्द

21.सुवर्चा

22.सुपार्श्व

23.सुभाष

24.सुश्रुत

25.जय

26.विजय

27.ऋत

28.सुनय

29.वीतहव्य

30.धृति

31.बहुलाश्व

32.कृति

इस अन्तिम राजा कृति के साथ ही जनकवंश की समाप्ति मानी गयी है। इसे ही अन्यत्र 'कराल जनक' भी कहा गया है।[5] यहाँ परिगणित तेरहवें राजा क्षेमावी का अपर नाम कुछ लोगों ने 'क्षेमारि' भी माना है तथा महाभारतकालीन राजा क्षेमधूर्ति से उसकी समानता की बात कही है।[।आप का  तिवारी परिवार जय श्री राम 


रविवार, 26 अप्रैल 2020

लोकडाउन के दौरान महाभारत कुछ न्याय पूण्य बात

लोकडाउन के समय ज्ञान वर्धन हेतु ____________________________

बहुत सारे मित्रों ने कहा कि महाभारत के चीर-हरण प्रसङ्ग पर लिखिये।
     मुझे लगता है महाभारत एक पूर्ण न्यायशास्त्र है, और चीर-हरण उसका केन्द्रबिन्दु! इस प्रसङ्ग के बाद की पूरी कथा इस घिनौने अपराध के अपराधियों को मिले दण्ड की कथा है। वह दण्ड, जिसे निर्धारित किया भगवान श्रीकृष्ण ने और किसी को नहीं छोड़ा... किसी को भी नहीं।
    दुर्योधन ने उस अबला स्त्री को दिखा कर अपनी जंघा ठोकी थी, तो उसकी जंघा तोड़ी गयी। दुशासन ने छाती ठोकी तो उसकी छाती फाड़ दी गयी। महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया।
     भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखे... भारत का कोई बुजुर्ग अपने सामने अपने बच्चों को मरते देखना नहीं चाहता, पर भीष्म अपने सामने चार पीढ़ियों को मरते देखते रहे। जबतक सब देख नहीं लिया, तबतक मर भी न सके... यही उनका दण्ड था।  
     धृतराष्ट्र का दोष था पुत्रमोह, तो सौ पुत्रों के शव को कंधा देने का दण्ड मिला उन्हें। सौ हाथियों के बराबर बल वाला धृतराष्ट्र सिवाय रोने के और कुछ नहीं कर सका।
     दण्ड केवल कौरव दल को ही नहीं मिला था। दण्ड पांडवों को भी मिला। द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाली थी, सो उनकी रक्षा का दायित्व सबसे अधिक अर्जुन पर था। अर्जुन यदि चुपचाप उनका अपमान देखते रहे, तो सबसे कठोर दण्ड भी उन्ही को मिला। अर्जुन पितामह भीष्म को सबसे अधिक प्रेम करते थे, तो कृष्ण ने उन्ही के हाथों पितामह को निर्मम मृत्यु दिलाई। अर्जुन रोते रहे, पर तीर चलाते रहे... क्या लगता है, अपने ही हाथों अपने अभिभावकों, भाइयों की हत्या करने की ग्लानि से अर्जुन कभी मुक्त हुए होंगे क्या? नहीं... वे जीवन भर तड़पे होंगे। यही उनका दण्ड था।
    युधिष्ठिर ने स्त्री को दाव पर लगाया, तो उन्हें भी दण्ड मिला। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ने वाले युधिष्ठिर ने युद्धभूमि में झूठ बोला, और उसी झूठ के कारण उनके गुरु की हत्या हुई। यह एक झूठ उनके सारे सत्यों पर भारी रहा... धर्मराज के लिए इससे बड़ा दण्ड क्या होगा?
     दुर्योधन को गदायुद्ध सिखाया था स्वयं बलराम ने। एक अधर्मी को गदायुद्ध की शिक्षा देने का दण्ड बलराम को भी मिला। उनके सामने उनके प्रिय दुर्योधन का वध हुआ और वे चाह कर भी कुछ न कर सके... 
     उस युग में दो योद्धा ऐसे थे जो अकेले सबको दण्ड दे सकते थे, कृष्ण और बर्बरीक। पर कृष्ण ने ऐसे कुकर्मियों के विरुद्ध शस्त्र उठाने तक से इनकार कर दिया, और बर्बरीक को युद्ध मे उतरने से ही रोक दिया। लोग पूछते हैं कि बर्बरीक का वध क्यों हुआ? यदि बर्बरीक का बध नहीं हुआ होता तो द्रौपदी के अपराधियों को यथोचित दण्ड नहीं मिल पाता। कृष्ण युद्धभूमि में विजय और पराजय तय करने के लिए नहीं उतरे थे, कृष्ण कृष्णा के अपराधियों को दण्ड दिलाने उतरे थे।
     कुछ लोगों ने कर्ण का बड़ा महिमामण्डन किया है। पर सुनिए! कर्ण कितना भी बड़ा योद्धा क्यों न रहा हो, कितना भी बड़ा दानी क्यों न रहा हो, एक स्त्री के वस्त्र-हरण में सहयोग का पाप इतना बड़ा है कि उसके समक्ष सारे पुण्य छोटे पड़ जाएंगे। द्रौपदी के अपमान में किये गए सहयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि वह महानीच व्यक्ति था, और उसका वध ही धर्म था।
     स्त्री कोई वस्तु नहीं कि उसे दाव पर लगाया जाय। कृष्ण के युग में दो स्त्रियों को बाल से पकड़ कर घसीटा गया। देवकी का बाल पकड़ा कंस ने, और द्रौपदी का बाल पकड़ा दुशासन ने। श्रीकृष्ण ने स्वयं दोनों के अपराधियों का समूल नाश किया। किसी स्त्री के अपमान का दण्ड  अपराधी के समूल नाश से ही पूरा होता है, भले वह अपराधी विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ही क्यों न हो... यही न्याय है, यही धर्म है। और इस धर्म को स्थापित करने वाला भारत है, सनातन है...
आप का धन्यवाद 
आप का तिवारी परिवार  जय श्री राधे 

रविवार, 19 अप्रैल 2020

राम के नाम ने कैसे बचाई जान

एक आदमी ❄बर्फ बनाने वाली कम्पनी में काम करता था___
एक दिन कारखाना बन्द होने से पहले अकेला फ्रिज करने वाले कमरे का चक्कर लगाने गया तो गलती से दरवाजा बंद हो गया
और वह अंदर बर्फ वाले हिस्से में फंस गया..
छुट्टी का वक़्त था और सब काम करने वाले लोग घर जा रहे थे
किसी ने भी अधिक ध्यान नहीं दिया की कोई अंदर फंस गया है।
वह समझ गया की दो-तीन घंटे बाद उसका शरीर बर्फ बन जाएगा अब जब मौत सामने नजर आने लगी तो
भगवान को सच्चे मन से याद करने लगा।
अपने कर्मों की क्षमा मांगने लगा और भगवान से कहा कि 
प्रभु अगर मैंने जिंदगी में कोई एक काम भी मानवता व धर्म का किया है तो तूम मुझे यहाँ से बाहर निकालो।
मेरे बीवी बच्चे मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। उनका पेट पालने वाला इस दुनिया में सिर्फ मैं ही हूँ।
मैं पुरे जीवन आपके इस उपकार को याद रखूंगा और इतना कहते कहते उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।
एक घंटे ही गुजरे थे कि अचानक फ़्रीजर रूम में खट खट की आवाज हुई।
दरवाजा खुला चौकीदार भागता हुआ आया।
उस आदमी को उठाकर बाहर निकाला और 🔥 गर्म हीटर के पास ले गया।
उसकी हालत कुछ देर बाद ठीक हुई तो उसने चौकीदार से पूछा, आप अंदर कैसे आए ?
चौकीदार बोला कि साहब मैं 20 साल से यहां काम कर रहा हूं। इस कारखाने में काम करते हुए हर रोज सैकड़ों मजदूर और ऑफिसर कारखाने में आते जाते हैं।
मैं देखता हूं लेकिन आप उन कुछ लोगों में से हो, जो जब भी कारखाने में आते हो तो मुझसे हंस कर 
*राम राम* करते हो
और हालचाल पूछते हो और निकलते हुए आपका 
*राम राम काका*
कहना मेरी सारे दिन की थकावट दूर कर देता है।
जबकि अक्सर लोग मेरे पास से यूं गुजर जाते हैं कि जैसे मैं हूं ही नहीं।
आज हर दिनों की तरह मैंने आपका आते हुए अभिवादन तो सुना लेकिन 
*राम राम काका* 
सुनने के लिए इंतज़ार 
करता रहा।
जब ज्यादा देर हो गई तो मैं आपको तलाश करने चल पड़ा कि कहीं आप किसी मुश्किल में ना फंसे हो।
वह आदमी हैरान हो गया कि किसी को हंसकर
*राम राम* कहने जैसे छोटे काम की वजह से आज उसकी जान बच गई।
*राम कहने से तर जाओगे*
मीठे बोल बोलो, 
संवर जाओगे,
सब की अपनी जिंदगी है 
यहाँ कोई किसी का नही खाता है।
जो दोगे औरों को,
वही वापस लौट कर आता है।
 तो बोलो जय श्रीराम राम  ।
आप का तिवारी परिवार जय हिंद 
जय श्री राम 

सभी ब्रामण का गोत्र कैसे और कहाँ उत्पत्ति हुई

सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव :  गर्ग (शुक्ल- वंश) गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शु...