मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

जय श्री राधे जय श्री कृष्ण ।हम आप लोग से पूछना चाहते है कि पूजा करने की सच्ची बींध क्या है प्रेम या बेद

कौन शूद्र कौन ब्राह्मण........

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🌺एक शूद्र महिला रानी रासमणि ने मंदिर बनवाया। चूंकि वह शूद्र थी, उसके मंदिर में कोई ब्राह्मण पूजा करने को राजी न हुआ। हालांकि रासमणि खुद भी कभी मंदिर में अंदर नहीं गई थी, क्योंकि कहीं मंदिर अपवित्र न हो जाए! यह तो ब्राह्मण होने का लक्षण हुआ। जो अपने को शूद्र समझे, वह ब्राह्मण। जो अपने को ब्राह्मण समझे, वह शूद्र।

रासमणि कभी मंदिर के पास भी नहीं गई, भीतर भी नहीं गई, बाहर-बाहर से घूम आती थी। दक्षिणेश्वर का विशाल मंदिर उसने बनाया था, लेकिन कोई पुजारी न मिलता था। और रासमणि शूद्र थी, इसलिए वह खुद पूजा न कर सकती थी। मंदिर क्या बिना पूजा के रह जाएगा? वह बड़ी दुखी थी, बड़ी पीड़ित थी। रोती थी, चिल्लाती थी--कि कोई पुजारी भेज दो!

फिर किसी ने खबर दी कि गदाधर नाम का एक ब्राह्मण लड़का है, उसका दिमाग थोड़ा गड़बड़ है, शायद वह राजी हो जाए। क्योंकि यह दुनिया इतनी समझदार है कि इसमें शायद गड़बड़ दिमाग के लोग ही कभी थोड़े से समझदार हों तो हों। यह गदाधर ही बाद में रामकृष्ण बना।

गदाधर को पूछा। उसने कहा कि ठीक है, आ जाएंगे। उसने एक बार भी न कहा कि ब्राह्मण होकर मैं शूद्र के मंदिर में कैसे जाऊं? गदाधर ने कहा, ठीक है। प्रार्थना यहां करते हैं, वहां करेंगे। घर के लोगों ने भी रोका, मित्रों ने भी कहा कि कहीं और नौकरी दिला देंगे। नौकरी के पीछे अपने धर्म को खो रहा है? पर गदाधर ने कहा, नौकरी का सवाल नहीं है; भगवान बिना पूजा के रह जाएं, यह बात जंचती नहीं; करेंगे।
मगर तब खबर रासमणि को मिली कि यह पूजा तो करेगा, लेकिन पूजा में यह दीक्षित नहीं है। इसने कभी पूजा की नहीं है। यह अपने घर ही करता रहा है। इसकी पूजा का कोई शास्त्रीय ढंग, विधि-विधान नहीं है। और इसकी पूजा भी जरा अनूठी है। 

कभी करता है, कभी नहीं भी करता। कभी दिन भर करता है, कभी महीनों भूल जाता है। और भी इसमें कुछ गड़बड़ हैं; कि यह भी खबर आई है कि यह पूजा करते वक्त पहले खुद भोग लगा लेता है अपने को, फिर भगवान को लगाता है। खुद चख लेता है मिठाई वगैरह हो तो। रासमणि ने कहा, अब आने दो। कम से कम कोई तो आता है।

वह आया, लेकिन ये गड़बड़ें शुरू हो गईं। कभी पूजा होती, कभी मंदिर के द्वार बंद रहते। कभी दिन बीत जाते, घंटा न बजता, दीया न जलता; और कभी ऐसा होता कि सुबह से प्रार्थना चलती तो बारह-बारह घंटे नाचते ही रहते रामकृष्ण।

आखिर रासमणि ने कहा कि यह कैसे होगा? ट्रस्टी हैं मंदिर के, उन्होंने बैठक बुलाई। उन्होंने कहा, यह किस तरह की पूजा है? किस शास्त्र में लिखी है?

रामकृष्ण ने कहा, शास्त्र से पूजा का क्या संबंध है? पूजा प्रेम की है। जब मन ही नहीं होता करने का, तो करना गलत होगा। और वह तो पहचान ही लेगा कि बिना मन के किया जा रहा है। तुम्हारे लिए थोड़े ही पूजा कर रहा हूं। उसको मैं धोखा न दे सकूंगा। जब मन ही करने का नहीं हो रहा, जब भाव ही नहीं उठता, तो झूठे आंसू बहाऊंगा, तो परमात्मा पहचान लेगा। वह तो पूजा न करने से भी बड़ा पाप हो जाएगा कि भगवान को धोखा दे रहा हूं। जब उठता है भाव तो इकट्ठी कर लेता हूं। दो तीन सप्ताह की एक दिन में निपटा देता हूं। लेकिन बिना भाव के मैं पूजा न करूंगा।

और उन्होंने कहा, तुम्हारा कुछ विधि-विधान नहीं मालूम पड़ता। कहां से शुरू करते, कहां अंत करते।

रामकृष्ण ने कहा, वह जैसा करवाता है, वैसा हम करते हैं। हम अपना विधि-विधान उस पर थोपते नहीं। यह कोई क्रियाकांड नहीं है, पूजा है। यह प्रेम है। रोज जैसी भाव-दशा होती है, वैसा होता है। कभी पहले फूल चढ़ाते हैं, कभी पहले आरती करते हैं। कभी नाचते हैं, कभी शांत बैठते हैं। कभी घंटा बजाते हैं, कभी नहीं भी बजाते। जैसा आविर्भाव होता है भीतर, जैसा वह करवाता है, वैसा करते हैं। हम कोई करने वाले नहीं।
उन्होंने कहा, यह भी जाने दो। लेकिन यह तो बात गुनाह की है कि तुम पहले खुद चख लेते हो, फिर भगवान को भोग लगाते हो! कहीं दुनिया में ऐसा सुना नहीं। पहले भगवान को भोग लगाओ, फिर प्रसाद ग्रहण करो। तुम भोग खुद को लगाते हो, प्रसाद भगवान को देते हो।

रामकृष्ण ने कहा, यह तो मैं कभी न कर सकूंगा। जैसा मैं करता हूं, वैसा ही करूंगा। मेरी मां भी जब कुछ बनाती थी तो पहले खुद चख लेती थी, फिर मुझे देती थी। पता नहीं, देने योग्य है भी या नहीं। कभी मिठाई में शक्कर ज्यादा होती है, मुझे ही नहीं जंचती, तो मैं उसे नहीं लगाता। कभी शक्कर होती ही नहीं, मुझे ही नहीं जंचती, तो भगवान को कैसे प्रीतिकर लगेगी? जो मेरी मां न कर सकी मेरे लिए, वह मैं परमात्मा के लिए नहीं कर सकता हूं।

ऐसे प्रेम से जो भक्ति उठती है, वह तो रोज-रोज नई होगी। उसका कोई क्रियाकांड नहीं हो सकता। उसका कोई बंधा हुआ ढांचा नहीं हो सकता। प्रेम भी कहीं ढांचे में हुआ है? पूजा का भी कहीं कोई शास्त्र है? प्रार्थना की भी कोई विधि है? वह तो भाव का सहज आवेदन है। भाव की तरंग है।
श्री राधे   जय श्री कृष्णा। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राधे राधे।👃👃👃👃👃👃👃👃👃👃👃
आप का तिवारी परिवार 

हनुमान चालीसा का सही अर्थ आप जानें

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हम सब हनुमान चालीसा पढते हैं, सब रटा रटाया।

क्या हमे चालीसा पढते समय पता भी होता है कि हम हनुमानजी से क्या कह रहे हैं या क्या मांग रहे हैं?

बस रटा रटाया बोलते जाते हैं। आनंद और फल शायद तभी मिलेगा जब हमें इसका मतलब भी पता हो।

तो लीजिए पेश है श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित!!

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श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
📯《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।★
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बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।★
📯《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।★
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जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥★
📯《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।★
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राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥★
📯《अर्थ》→ हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।★
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महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥★
📯《अर्थ》→ हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।★
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कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥★
📯《अर्थ》→ आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।★
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हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥★
📯《अर्थ》→ आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।★
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शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥★
📯《अर्थ 》→ हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।★
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विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥★
📯《अर्थ 》→ आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।★
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प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥★
📯《अर्थ 》→ आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।★
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सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥★
📯《अर्थ》→ आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।★
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भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥★
📯《अर्थ 》→ आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।★
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लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥★
📯《अर्थ 》→ आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।★
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रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।★
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सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥★
📯《अर्थ 》→ श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।★
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सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥★
📯《अर्थ》→श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।★
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जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥★
📯《अर्थ 》→ यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।★
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तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥★
📯《अर्थ 》→ आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।★
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तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥★
📯《अर्थ 》→ आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।★
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जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥★
📯《अर्थ 》→ जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।★
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प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥★
📯《अर्थ 》→ आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।★
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दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥★
📯《अर्थ 》→ संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।★
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राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।★
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सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥★
📯《अर्थ 》→ जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।★
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आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥★
📯《अर्थ. 》→ आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।★
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भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥★
📯《अर्थ 》→ जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।★
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नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥★
📯《अर्थ 》→ वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।★
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सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥★
📯《अर्थ 》→ तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।★
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और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥★
📯《अर्थ 》→ जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।★
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥★
📯《अर्थ 》→ चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।★
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साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥★
📯《अर्थ 》→ हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।★
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अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥★
📯《अर्थ 》→ आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।★
1.) अणिमा → जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।★
2.) महिमा → जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।★
3.) गरिमा → जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।★
4.) लघिमा → जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।★
5.) प्राप्ति → जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।★
6.) प्राकाम्य → जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।★
7.) ईशित्व → जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।★
8.)वशित्व → जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।★
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राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥★
📯《अर्थ 》→ आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।★
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तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥★
📯《अर्थ 》→ आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।★
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अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥★
📯《अर्थ 》→ अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।★
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और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।★
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संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥★
📯《अर्थ 》→ हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥★
📯《अर्थ 》→ हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।★
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जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥★
📯《अर्थ 》→ जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।★
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जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥★
📯《अर्थ 》→ भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।★
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तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥★
📯《अर्थ 》→ हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।★
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पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥★
📯《अर्थ 》→ हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।★
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

जय श्री राम  जाकी रही भावना जैसी हरि मूरत देखी तिन तैसी।
 यह आपके विचारों पर। निर्धारित करता है कि आप भगवान को किस रूप में देखना चाहते हैं। जय श्रीराम। जय श्रीराम जय श्रीराम।
आप का तिवारी परिवार 

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

भ्रम फैलाने में क्यों और कैसे सफलता मिलीती है दलित और ब्राह्मण बिच जितना फैलाया उसपर आप खुद ही बिचार कीजिए

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#ब्राह्मणों_को_कोसने_वालों_इतिहास_को_ठीक_से_पढ़_लो..।।
त्रेता युग में क्षत्रियों का शासन था ! 
महाभारत काल मे यादव क्षत्रियों का शासन था ! 

उसके बाद दलित-मौर्य और बौद्धो का राज था ! 

उसके बाद 600 साल मुसलमान बादशाह (अरबी लुटेरों) का राज था 
फिर 300 साल अंग्रेज राज था, 
पिछले 70 वर्षों से अंबेडकर का संविधान राजकाज चला रहा है़।
लेकिन फिर भी सब पर अत्याचार ब्राहमणों द्वारा किया गया... अमेजिंग ।
मूर्खता की कोई सीमा नही!!
#ब्राह्मणों_को_गाली_देना__कोसना__उन्हें__कर्मकांडी__पाखंडी__लालची__भ्रष्ट__ढोंगी__जैसे__विशेषणों_के_द्वारा__अपमानित_करना_आजकल_ट्रेंड_में_है।

कुछ लोग ब्राह्मणों को सबक सिखाना चाहते हैं, कुछ उन्हें मंदिरों से बाहर कर देना चाहते हैं.. वगैरह-वगैरह।

कुछ कथित रूप से पिछड़े लोगों को लगता है कि ब्राह्मणों की वजह से ही वो 'पिछड़े' रह गये, दलितों की अपनी दलीलें हैं, कभी-कभी अन्य जातियों के लोगों के श्रीमुख से भी इस तरह की बातें सुनने को मिल जाती हैं।

#आमतौर_से_ये_धारणा_बनाई_जा_रही_है कि ब्राह्मणों की वजह से समाज पिछड़ा रह गया, लोग अशिक्षित रह गये, समाज जातियों में बंट गया, देश में अंधविश्वासों को बढ़ावा मिला.. वगैरह-वगैरह।

आज, ऐसे सभी माननीयों को हृदय से धन्यवाद देते हुए मैं आपको जवाब दे रहा हूं...
इस वैधानिक चेतावनी के साथ कि मैं किसी प्रकार की जातीय श्रेष्ठता में विश्वास नहीं रखता।

लेकिन आप जान लीजिये- #वो__कौटिल्य_जिसने__संपूर्ण__मगध__साम्राज्य_को_संकटों_से_मुक्ति_दिलाई,
#देश_में__जनहितैषी__सरकार_की__स्थापना_कराई__भारत_की_सीमाओं_को_ईरान_तक_पहुंचा द_या और #कालजयी_ग्रन्थ___अर्थशास्त्र__की__रचना की (जिसे आज पूरी दुनिया पढ़ रही है) वो कौटिल्य ब्राह्मण थे।
#आदि शंकराचार्य जिन्होंने संपूर्ण हिंदू समाज को
____एकता_के_सूत्र में बांधने के प्रयास किये, 8वीं ।

सदी में ही पूरे देश का भ्रमण किया, विभिन्न विचारधाराओं
वाले तत्कालीन विद्वानों-मनीषियों से शास्त्रार्थ कर उन्हें हराया,
देश के चार कोनों में चार मठों की स्थापना कर हर हिंदू के
लिए चार धाम की यात्रा का विधान किया, जिससे आप इस देश को समझ सके। वो शंकराचार्य ब्राह्मण थे।

कर्नाटक के जिन लिंगायतों को कांग्रेसी हिंदूओं से अलग
करना चाहते हैं, उनके गुरु और
#लिंगायत_के_संस्थापक_बसव_भी ब्राह्मण थे।

भारत में सामाजिक-वैचारिक उत्थान, विभिन्न जातियों की
समानता, छुआछूत-भेदभाव के खिलाफ समाज को एक
करने वाले भक्ति आंदोलन के प्रमुख #संत_रामानंद, (जो
केवल कबीर के ही नहीं बल्कि संत रैदास के भी गुरु थे)
ब्राह्मण थे।
आज दिल्ली में जिस भव्य #अक्षरधाम मंदिर के दर्शन
करके दलितों समेत सभी जातियों के लोग खुद को धन्य
मानते हैं, उस
#मंदिर__की_स्थापना_करने_वाला__स्वामीनारायण
____संप्रदाय है जिसके_जन_घनश्याम_पांडेय भी ब्राह्मण

थे।

वक्त के अलग-अलग कालखंड में हिंदू समाज में व्याप्त हो
चुकी बुराईयों को दूर करने के लिए 'आर्य समाज' व 'ब्रह्म
समाज' के रूप में जो दो बड़े आंदोलन देश में खड़े हुए, इन
दोनों के ही जनक क्रमश: स्वामी दयानंद सरस्वती व राजा
राममोहन राय (जिन्होंने हमें सती प्रथा से मुक्ति दिलाई)
ब्राह्मण थे।
भारत में #विधवा_विवाह_की_शुरुआत करान_
वाले ईश्वरचंद्र विद्यासागर भी ब्राह्मण थे। इन सभी संतों ने
जाति-पांति, छुआछूत, भेदभाव के खिलाफ समाज को ।
जागरुक करने में अपना जीवन खपा दिया- लेकिन समाज
नहीं सुधरा।

भगवान श्रीराम की महिमा को '#रामचरित मानस' के
जरिये घर-घर में पहुंचाने वाले #तुलसीदास और भगवान

श्रीकृष्ण की भक्ति की लहर पैदा करने वाले #वल्लभाचार्य
__ भी ब्राह्मण थे।
ये भी याद रखिये- मंदिरों में ब्राह्मणों का वर्चस्व था, जैसा कि
आप लोग कहते हैं, फिर भी भारत में भगवान परशुराम
(ब्राह्मण) के मंदिर सामान्यत: नहीं मिलते। ये है ब्राह्मणों की
भावना।

विदेशी आधिपत्य के खिलाफ सबसे पहले विद्रोह का बिगुल
बजाने संन्यासियों में से अधिकांश लोग ब्राह्मण थे।
#अंग्रेजों_की_तोपों के सामने सीना_तानने_वाले_मं
गल_पांडेय_रानी_लक्ष्मीबाई, अंग्रेज अफसरों के लिए

दहशत का पर्याय बन चुके #चंद्रशेखर-आजाद, फांसी के
__ फंदे पर झूलने वाले #राजगुरु - ये सभी ब्राह्मण थे।

#वंदेमातरम जैसी_कालजयी रचना से पूरे देश में
देशभक्ति का ज्वार पैदा करने वाले #बंकिमचद्र चटर्जी_जन_गण_मन_के_रचयिता
____रविंद्र नाथ टैगोर ब्राह्मण,
देश के पहले आईएएस (तत्कालीन ICS) सत्येंद्रनाथ टैगोर
भी ब्राह्मण। स्वतंत्रता आंदोलन के नायक
#गोपालकृष्ण_गोखले (गांधी जी के गुरु),
#बाल गंगाधर तिलक राजगोपालाचारी ब्राह्मण।
भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में #अटल बिहारी
वाजपेयी भी ब्राह्मण।

नेहरु सरकार से त्यागपत्र देने वाले पहले मंत्री जिन्होंने पद की
बजाय जनहित के लिए संघर्ष का रास्ता चुना और कश्मीर के
सवाल पर अपने प्राणों की आहुति दी- वो
#डॉ_श्यामा प्रसा_मुखर्जी भी ब्राह्मण।
#बीजेपी_के_सबसे_बड़े सिद्धांतकार_पंडित दीनदयाल
_उपाध्याय...
हिंदू समाज की एकता, जातिविहीन समाज की स्थापना और
सांस्कृतिक गौरव की पुनर्स्थापना के लिए खड़ा हुआ दुनिया
का सबसे बड़ा
#स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ_की__नींव_ए
क गरीब ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले पूज
य_डॉ हेडगेवार_जी_ने_डाली थी।
उन्होंने अपने खून का कतरा-कतरा हिंदूओं को ताकत देने और उन्हें एकसूत्र में पिरोने में खपा दिया, केवल ब्राह्मणों की चिंता नहीं की#संघ__के_दूसरे_सरसंघचालक-_डॉ_ गोलवलकर-_जिन्होंने संपूर्ण हिंदू समाज को ताकत देने के
लिए सारा जीवन समर्पित कर दिया- वो भी ब्राह्मण।

यही नहीं,
#देश में पहली_कम्यूनिस्ट सरकार_केरल में बनाने
__वाले_नंबूदरीपाद_समेत मार्क्सवादी आंदोलन के कई
प्रमुख रणनीतिकार ब्राह्मण ही थे।
समकालीन नेताओं की बात करें तो तमिलनाडु में
#जयललिता ब्राह्मण थीं,
मायावती, जिन्होंने 'तिलक-तराजू और तलावर, इनको मारो
जूते चार' जैसा अपमानजनक नारा बार-बार लगवाया, उन
पर जब लखनऊ के गेस्ट हाउस में सपा के गुंडों ने जानलेवा
हमला किया, उन्हें मारा-पीटा, उनके कपड़े फाड़े, और शायद
उनकी हत्या करने वाले थे, उस समय जान पर खेलकर उन
गुंडों से लड़ने वाले और
#मायावती_को_सुरक्षित_वहां_से_निकालने वाले
____स्वर्गीय ब्रह्मदत्त द्विवेदी भी ब्राह्मण थे।

जिस #लता मंगेशकर की आवाज को ये देश सम्मोहित
होकर सुनता रहा और जिस #सचिन तेंदुलकर के हर शॉट
पर प्रत्येक जाति का युवा ताली बजाकर खुश होता रहा - ये
दोनों ही ब्राह्मण।

फिर भी, जिन्हें लगता है कि ब्राह्मण केवल मंदिर में घंटा बजाना जानता है- वो ये भी जान लें कि भारत के इतिहास का
सबसे महान घुड़सवार योद्धा और सेनानायक-जिन्होने 20 साल
के अपने राजनीतिक जीवन में 41 युद्ध लङे लेकिन कभी कोई युद्ध नहीं हारा,
जिसने मुस्लिम शासकों के आंतक से कराहते देश में भगवा
पताकाओं को चारों दिशाओं में लहरा दिया और जिसे
बाजीराव-मस्तानी फिल्म में देखकर आपने भी तालियां ठोंकी
होंगी, - वो #बाजीराव_बल्लाल भी ब्राह्मण था।

#तो ब्राह्मणों_को_कोसने वालों_इतिहास_को_ठीक_से_प
ढ़ लो..।।

सभी ब्राह्मण बन्धुओं से निवेदन करता हूं कि अपने पूर्वजों का
इतिहास बच्चों को जरूर बताएं ।
ब्राह्मणों ने सिर्फ इतिहास बदला है,,हर हर महादेव।।

★#जय_ब्राह्मण_देव* 
 विप्र धेनु सुर संत हित  लीन मनूज औतार निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन, गोपाल सियापति रामचंद्र की की जय  आप का तिवारी परिवार 


कुछ बातें हमे सोचने पर मजबूर कर ती है एक स्त्री का सौन्दर्य उसके पति लिए होता है


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एक स्त्री का सौन्दर्य उसके पति के लिए होता है।
फिर मुझे आज तक ये समझ में नहीं आयी कि ये स्त्रियाँ अपना नग्न शरीर अपने पति के अलावा किसको और क्यूँ और किसलिए दिखाती हैं। 

हमारे धर्म में तो अपने पति परमेश्वर के अलावा गैर पुरुष के लिए प्रेम होना या सोचना भी पाप माना जाता है या अपने पति के अलावा गैर से नजरें मिलाना भी हमारे लिए पाप है।

लड़कियों के अनावश्यक नग्नता वाली पोशाक में घूमने पर तर्क है इन कपड़ो के पीछे कुछ लड़कियां कहती हैं कि हम क्या पहनेगें ये हम तय करेंगे पुरुष नहीं।
जी बहुत अच्छी बात है आप ही तय करें। लेकिन कुछ पुरुष भी कहते हैं हम किस लड़कियों का सम्मान, मदद करेंगे ये भी हम तय करेंगे। और हम किसी का सम्मान नहीं करेंगे इसका अर्थ ये नहीं कि हम उसका अपमान करेंगे। 

फिर कुछ विवेकहीन लड़कियां कहती हैं कि हमें आजादी है अपनी ज़िन्दगी जीने की। जी बिल्कुल आजादी है ऐसी आजादी सबको मिले। व्यक्ति को चरस गांजा ड्रग्स ब्राउन शुगर लेने की आज़ादी हो। मांस खाने की आजादी हो वैश्यालय जाने और खोलने की आज़ादी हो हर तरफ से व्यक्ति को आजादी हो हमें औरतों से क्या समस्या है। 

लड़कों को संस्कारो का पाठ पढ़ाने वाला कुंठित स्त्री समुदाय क्या इस बात का उत्तर देगी। क्या भारतीय परम्परा में ये बात शोभा देती है की एक लड़की अपने भाई या पिता के आगे अपने निजी अंगो का प्रदर्शन बेशर्मी से करे। 

क्या ये लड़कियां पुरुषों को भाई/पिता की नज़र से देखती हैं। 
जब ये खुद पुरुषों को भाई/पिता की नज़र से नहीं देखती तो फिर खुद किस अधिकार से ये कहती है की हमें माँ/बहन की नज़र से देखो। 

कौन सी माँ बहन अपने भाई बेटे के आगे नंगी होती है। भारत में तो ऐसा कभी नहीं होता था। 

सत्य ये है की अश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधो की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दूकान है। और इसका उत्पादन स्त्री समुदाय करती है।
मष्तिष्क विज्ञान के अनुसार 4 तरह के नशों में एक नशा अश्लीलता भी है। 

चाणक्य ने चाणक्य सूत्र में अश्लीलता को सबसे बड़ा नशा और बीमारी बताया है। अगर ये नग्नता आधुनिकता का प्रतीक है तो फिर पूरा नग्न होकर स्त्रियां अत्याधुनिकता का परिचय क्यों नहीं देतीं। 

गली गली और हर मोहल्ले में जिस तरह शराब की दुकान खोल देने पर बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है उसी तरह अश्लीलता समाज में यौन अपराधो को जन्म देती है।

मेरा मकसद किसी का दिल दुखाना नहीं है।
सभी को अपना जीवन अपने तरीके से जीने का अधिकार है बस तरीका सही होना चाहिए। क्योंकि गलत तरीके से इज्जत और सम्मान की आशा नहीं किया जा सकता। 
🚩जय श्री परशुराम 🚩हर हर महादेव 🚩🙏

जनेऊ एक धागा नहीं इस का अनेक फयद और जनेऊ के बारें में अनेक जानकारी आप खुद ही देख

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#जनेऊ--

जनेऊ का नाम सुनते ही सबसे पहले जो चीज़ मन मे आती है
वो है धागा दूसरी चीज है ब्राम्हण ।। जनेऊ का संबंध क्या
सिर्फ ब्राम्हण से है , ये जनेऊ पहनाए क्यों है , क्या इसका
कोई लाभ है, जनेऊ क्या ,क्यों ,कैसे आज आपका परिचय
इससे ही करवाते है ----

#जनेऊ_को_उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध,
मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र के नाम से भी जाना जाता है ।।

हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों (आप सभी को 16 संस्कार पता
होंगे लेकिन वो प्रधान संस्कार है 8 उप संस्कार है जिनके
विषय मे आगे आपको जानकारी दूंगा ) में से एक 'उपनयन
संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे
'यज्ञोपवीतधारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का
पालन करना अनिवार्य होता है। उपनयन का शाब्दिक अर्थ है
"सन्निकट ले जाना" और उपनयन संस्कार का अर्थ है--
"ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना"

#हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना
और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन
सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।ब्राह्मण
ही नहीं समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है।जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा
स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ
होता है दूसरा जन्म। मतलब सीधा है जनेऊ संस्कार के बाद
ही शिक्षा का अधिकार मिलता था और जो शिक्षा नही ग्रहण
करता था उसे शूद्र की श्रेणी में रखा जाता था(वर्ण
व्यवस्था)।।

#लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो,

वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित
__ छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से

तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

#जनेऊ_का_आध्यात्मिक महत्व --

#जनेऊ_में_तीन-सूत्र - त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के
प्रतीक - देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक -
सत्व, रज और तम के प्रतीक होते है। साथ ही ये तीन सूत्र
गायत्री मंत्र के तीन चरणों के प्रतीक है तो तीन आश्रमों के
प्रतीक भी। जनेऊ के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं।
अत: कुल तारों की संख्या नौ होती है। इनमे एक मुख, दो
नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा
मिलाकर कुल नौ होते हैं। इनका मतलब है - हम मुख से

अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से
__ अच्छा सुने। जनेऊ में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म,__ अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है। ये पांच यज्ञों, पांच

ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों के भी प्रतीक है।

#जनेऊ_की_लंबाई : जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है
क्यूंकि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32
विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। 32 विद्याएं
चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ
अरण्यक मिलाकर होती है। 64 कलाओं में वास्तु निर्माण,
व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र
निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण,
कृषि ज्ञान आदि आती हैं।

#जनेऊ_के_लाभ --

#प्रत्यक्ष लाभ जो आज के लोग समझते है -

""जनेऊ बाएं कंधे से दाये कमर पर पहनना चाहिये""||

___ #जनेऊ में नियम है कि -

मल-मूत्र विसर्जन के दौरान जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा

लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए।
__ इसका मूल भाव यह है कि जनेऊ कमर से ऊंचा हो जाए और

अपवित्र न हो। यह बेहद जरूरी होता है।मतलब साफ है कि जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति ये ध्यान रखता
है कि मलमूत्र करने के बाद खुद को साफ करना है इससे
उसको इंफेक्शन का खतरा कम से कम हो जाता है

#वो_लाभ_जो_अप्रत्यक्ष है जिसे कम लोग जानते है -

शरीर में कुल 365 एनर्जी पॉइंट होते हैं। अलग-अलग बीमारी
में अलग-अलग पॉइंट असर करते हैं। कछ पॉइंट कॉमन भी
होते हैं। एक्युप्रेशर में हर पॉइंट को दो-तीन मिनट दबाना होता
है। और जनेऊ से हम यही काम करते है उस point को हम
एक्युप्रेश करते है ।।
कैसे आइये समझते है

#कान के नीचे वाले हिस्से (इयर लोब) की रोजाना पांच
मिनट मसाज करने से याददाश्त बेहतर होती है। यह टिप
पढ़नेवाले बच्चों के लिए बहुत उपयोगी है।अगर भूख कम

करनी है तो खाने से आधा घंटा पहले कान के बाहर छोटेवाले
__ हिस्से (ट्राइगस) को दो मिनट उंगली से दबाएं। भूख कम

लगेगी। यहीं पर प्यास का भी पॉइंट होता है। निर्जला व्रत में
लोग इसे दबाएं तो प्यास कम लगेगी।

एक्युप्रेशर की शब्दवली में इसे point जीवी 20 या डीयू
20-
इसका लाभ आप देखे -__ #जीबी 20-

कहां: कान के पीछे के झकाव में।
उपयोग: डिप्रेशन, सिरदर्द, चक्कर और सेंस ऑर्गन यानी
नाक, कान और आंख से जुड़ी बीमारियों में राहत। दिमागी
असंतुलन, लकवा, और यूटरस की बीमारियों में असरदार।
(दिए गए पिक में समझे)

इसके अलावा इसके कुछ अन्य लाभ जो क्लीनिकली प्रोव है

1.#बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने
से ऐसे स्वप्न नहीं आते।
2. #जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की
संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू
रूप से संचालित होने लगता है।
3. #जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति सफाई नियमों में बंधा होता
है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों
से बचाती है।

4.#जनेऊ_को_दायें कान पर धारण करने से कान की वह
_ नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य
__ करती है।
ए  सब जानकारी  बहुत  से ग्रंथों से छूटाइ गयी हैं  
आप का तिवारी परिवार 

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

हिन्दू वो पर हमे सरम आती है डूब मरो धिक्कार है तुम्हारी निद्रा पार और सोते रहो तुम लोग जब तुम्हारी आने वालीं पीडीही तुम से पूछे गी तो तुम क्या जबाब दोगे की तब सेकुलर बनकर सो रहे थे

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वोटर ID कार्ड पर पड़ा बुर्का आज हट गया

सारे काग़ज़ बाहर निकलने के लिये मचल उठे हैं 

कल रात से ही जुम्मन मियाँ को नींद नहीं आ रही थी । जुम्मन मियाँ के दिल में तूफ़ान उठ रहा था । कल सुबह उनको वोट डालना था और इसकी खुशी उनके दिलो दिमाग़ में उछल कूद मचा रही थी । बड़ी मुश्किल से जुम्मन मियाँ सो पाए थे और सुबह उठते ही उनके दिल में पहला ख्याल यही आया कि आज बीजेपी के खिलाफ वोट डालना है । इस ख्याल ने एक बार फिर उनके ज़ेहन में सिर से पाँव तक सरसरी दौड़ा दी । लिहाज़ा... उन्होंने फौरन अरब की दिशा की तरफ मुंह करके सुबह की नमाज़ अता की और भारत में वोट डालने का अधिकार देने वाले अपने सारे काग़ज़ों की तरफ रुख किया ।

जुम्मन मियाँ ने अपने वोटर आईडी कार्ड को चूम लिया । यही वो काग़ज़ है जिसके बारे में उन्होंने रवीश जी को इंटरव्यू दिया था और बताया था कि उनका कागज तो बाढ़ में बह गया है । यही वो कागज है जिसके बारे में अरफा ने सवाल पूछा था तो उन्होंने जवाब दिया था कि काग़ज़ तो बकरी खा गई और बकरी को काटकर हम खा गए । यही वो कागज था जिसके लिये शाहीन बाग में महीने भर से जिहाद का जलसा चल रहा है । और यही वो काग़ज़ है जो आज वोट देने के लिए मचल रहा था । 

जुम्मन मियाँ को अपने वोटर आईडी कार्ड से उतनी ही मोहब्बत थी जितनी मुगलों के जमाने में बाबर और औरंगजेब को अपनी तलवार से थी । जुम्मन मियाँ आज अपने वोटर आईडी कार्ड को सहला सहला कर धार दे रहे थे । पुरानी और वंशानुगत आदतें इतनी आसानी से जाती भी कहां हैं । 

उसी वक्त उनके दिल में ये ख्याल आया कि आखिर वोट देना किसको है ? ये ख्याल आते ही कि वोट आम आदमी पार्टी को देना है उनका मुँह बहुत कड़वा हो गए । नामुराद.. केजरीवाल.. काफिर... हनुमान चालीसा पढ़ रहा था । बुतपरस्ती इस्लाम में नाक़ाबिले बर्दाश्त है ये सब ख्याल जुम्मन मियाँ को परेशान करने लगे । तभी उनकी रूह के अंदर से आवाज़ उठी.. जो सबसे कम राष्ट्रवादी है सबसे कम देशभक्त है और सबसे ज्यादा मुस्लिम परस्त है उसको वोट देना ही फ़र्ज़ है । 

और फिर अचानक जुम्मन मियां  ख्वाबों की दुनिया में चले गए । उनको मुगल राज नज़र आने लगा । मुगल राज जब आएगा... तब हम सारे वोटर आईडी कार्ड जलवा देंगे.. सारे काग़ज़ कुएँ में फेंकवा देंगे । अचानक ख्वाबों के धुँधलके में मुग़लिया दरबार की महफ़िलें नज़र आने लगी... अनारकली दरबार में नाचने लगीं .. कनीज़ें बोसा करने लगीं। काफिर औरतें बाज़ारों में बिकने लगी । मुश्रिकों की गर्दनें धड़ से उतरने लगीं । धरती डोलने लगी.. आसमान हिलने लगा... रूहें क़ब्रों से उठने लगीं... दरबार सजने लगा... जन्नत नजर आने लगीं.. हूरें गाउन तकिया लगाए उनका इंतज़ार करने लगीं.. तभी अचानक सलमा आ गईं.. उन्होंने ज़ोर से जुम्मन मियाँ को हिलाया और बोला... चलिए वोट देने चलना है किन ख्यालों में खोए हुए हैं ।

जुम्मन मियाँ के ख्वाबों के तार टूट गए । अचानक बुर्के में अपनी बीवी को देखा... कहां वो हूरों का हुस्न.. 72 पर्दों में ढकने के बाद भी नज़र आते लजीज़ अंग प्रत्यंग और कहां... । मियाँ को गुस्सा आ रहा था लेकिन वोट देना जरूरी था । उन्होंने अपनी घड़ी देखी... जो असलम मियाँ उनके लिए दुबई से लाए थे । उस घड़ी को वो दुनिया की सबसे नायाब घड़ी मानते थे । बहरहाल सुबह के आठ बज गए थे । और वो अपने पूरे परिवार के साथ पोलिंग बूथ की तरफ बढ़ चले । उन्होंने अपना वोट डाल दिया है । और उनके मन में कोई शर्मिंदगी भी नहीं है कि वो इतने दिनों से झूठ बोल रहे थे । लेकिन फिर उनको तालीम याद आ गई । काफिरों के खिलाफ की गई चालबाज़ी पर कोई सज़ा नहीं होती.. सिर्फ आपसी भाईचारे में कोई चालबाज़ी नहीं करनी चाहिए ।

इसी हिंदुस्तान में उनके पुरखों ने पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग को वोट डाला था और इसी हिंदुस्तान में आज वो पाकिस्तान परस्त पार्टियों को वोट डालते हैं । बाकी शी शी शी शी... हिंदू सो रहा है.. उसे सोने दो !


सत्यमेव जयते

वसुधैव कुटुम्बकम्

मुझे हिन्दूवो के बारें  में लिखने मे अब सरम आती है 
और क्या लिखूं आप लोग खुद ही समझदार  
आप का तिवारी परिवार  जय हिंद  जय भारत  जय सनातन 

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

हिंदुओं ने विवाह की परंपरा क्यों बदली?

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#हिन्दुओं में #विवाह #रात्रि में #क्यों #होने #लगे ?

क्या कभी आपने सोचा है कि हिन्दुओं में रात्रि को विवाह क्यों होने लगे हैं, जबकि हिन्दुओं में रात में शुभकार्य करना अच्छा नहीं माना जाता है क्योंकि ये निशाचरी समय होता है ?
  रात को देर तक जागना और सुबह को देर तक सोने को, राक्षसी प्रवृति बताया जाता है। रात में जागने वाले को निशाचर कहते हैं।

केवल तंत्र सिद्धि करने वालों को ही रात्रि में हवन व यज्ञ की अनुमति है।

वैसे भी प्राचीन समय से ही सनातन धर्मी हिन्दू दिन के प्रकाश में ही शुभ कार्य करने के समर्थक रहे हैं। तब हिन्दुओं में रात की विवाह की परम्परा कैसे पड़ी ?

कभी हम अपने पूर्वजों के सामने यह सवाल क्यों नहीं उठाते हैं  या  स्वयं इस प्रश्न का हल क्यों नहीं खोजते हैं ?

दरअसल भारत में सभी उत्सव, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं संस्कार दिन में ही किये जाते थे चूंकि ये सनातनी परम्परा है। सीता और द्रौपदी का स्वयंवर भी दिन में ही हुआ था। शिव विवाह से लेकर संयोगिता स्वयंवर (बाद में पृथ्वीराज चौहान जी द्वारा संयोगिता जी की इच्छा से उनका अपहरण) आदि सभी शुभ कार्यक्रम दिन में ही होते थे।

प्राचीन काल से लेकर मुगलों के आने तक भारत में विवाह दिन में ही हुआ करते थे। मुस्लिम  आक्रमणकारियों के भारत पर हमले करने के बाद ही, हिन्दुओं को अपनी कई प्राचीन परम्पराएं तोड़ने को विवश होना पड़ा था।

मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर अतिक्रमण करने के बाद भारतीयों पर बहुत अत्याचार किये गये। यह आक्रमणकारी  हिन्दुओं के विवाह के समय वहां पहुंचकर लूटपाट मचाते थे। अकबर के शासन काल में, जब अत्याचार चरमसीमा पर थे, मुग़ल सैनिक हिन्दू लड़कियों को बलपूर्वक उठा लेते थे और उन्हें अपने आकाओं को सौंप देते थे।

भारतीय ज्ञात इतिहास में सबसे पहली बार रात्रि में विवाह सुन्दरी और मुंदरी नाम की दो ब्राह्मण बहनों का हुआ था, जिनकी विवाह दुल्ला भट्टी ने अपने संरक्षण में ब्राह्मण युवकों से कराया था।
उस समय दुल्ला भट्टी ने अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाये थे। दुल्ला भट्टी ने ऐसी अनेकों लड़कियों को मुगलों से छुड़ाकर, उनका हिन्दू लड़कों से विवाह कराया।

उसके बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों के आतंक से बचने के लिए हिन्दू रात के अँधेरे में विवाह करने पर मजबूर होने लगे। लेकिन रात्रि में विवाह करते समय भी यह ध्यान रखा जाता है कि ...... नाचना-गाना, दावत, जयमाला, आदि भले ही रात्रि में हो जाए लेकिन वैदिक मन्त्रों के साथ फेरे प्रातः पौ फटने के बाद ही हों।

पंजाब से प्रारम्भ हुई परंपरा को पंजाब में ही समाप्त किया गया।
फिल्लौर से लेकर काबुल तक महाराजा रंजीत सिंह का राज हो जाने के बाद उनके सेनापति हरीसिंह नलवा ने सनातन वैदिक परम्परा अनुसार दिन में खुले आम विवाह करने और उनको सुरक्षा देने की घोषणा की थी। 
हरीसिंह नलवा के संरक्षण में हिन्दुओं ने दिनदहाड़े - बैंडबाजे के साथ विवाह शुरू किये।
तब से पंजाब में फिर से दिन में विवाह का प्रचालन शुरू हुआ। पंजाब में अधिकांश विवाह आज भी दिन में ही होते हैं।
महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, केरल, असम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा एवम् अन्य राज्य भी धीरे धीरे अपनी जड़ों की ओर लोटने लगे हैं। अतः इन प्रदेशों में दिन में विवाह होते हैं।
हरीसिंह नलवा ने मुसलमान बने हिन्दुओं की घर वापसी कराई, मुसलमानों पर जजिया कर लगाया, हिन्दू धर्म की परम्पराओं को फिर से स्थापित किया, इसीलिए उनको “पुष्यमित्र शुंग” का अवतार कहा जाता है।

सभी विवाह सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त ब्रह्ममुहूर्त में ही संपादित किये जाते हैं।  ध्रुवतारा को स्थिरता के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो ब्रह्ममुहूर्त में ही सबसे अच्छा दृष्टिगोचर होता है ।

लेकिन साक्षी सूर्य के प्रतीक स्वरूप अग्नि को ही माना जाता है। इसीलिए अग्नि के ही चारों ओर फेरे लिए जाने की विधि है।

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में रात्रि विवाह का पूर्ण खण्डन किया है।  पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार भी हिन्दू गायत्री परिवार में  विवाह दिन में ही सम्पन्न किये जाते हैं ....!!

आज भी, हम भारत के लोग, खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं बिहार के लोग, जबकि 400 साल हो गए मुगल यहां से चले गए, किन्तु आज भी उसे परंपरा मानकर उसे चला रहे हैं! असल में हम गुलामी की मानसिकता से उबरना ही नहीं चाहते हैं !

आप सभी से विनम्र निवेदन है कि इस प्रथा पर आप सब एक बार अवश्य विचार करें एवं अपनी पुरानी धुरी पर अवश्य वापस लौटें ।
आगे आप लोग  खुद  ही समझदार  है  
आप का तिवारी परिवार 

शनिवार, 25 जनवरी 2020

सोजावो मेंरे देश के हिन्दू समय ना ऐसा दूंजा हैं

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एक ट्रक के पीछे लिखी ये पंक्ति झकझोर गई..

"हॉर्न धीरे बजाओ मेरा हिन्दूसो रहा है"...

उस पर एक कविता इस प्रकार है कि...

'अँग्रेजों' के जुल्म सितम से,
फूट फूटकर 'रोया' है..
'धीरे' हॉर्न बजा रे पगले  
'देश' का हिन्दू सोया है।

आजादी संग 'चैन' मिला है
'पूरी' नींद से सोने दे...!!
जगह मिले वहाँ 'साइड' ले ले...
हो 'दुर्घटना' तो होने दे...!!
किसे 'बचाने' की चिंता में...
 तू इतना जो 'खोया' है...!!
'धीरे' हॉर्न बजा रे पगले ...
'देश' का हिन्दू सोया है....!!!

ट्रैफिक के सब 'नियम' पड़े हैं...
कब से 'बंद' किताबों में...!!
'जिम्मेदार' सुरक्षा वाले...
सारे लगे 'हिसाबों' में...!!
तू भी पकड़ा 'सौ' की पत्ती...
क्यों 'ईमान' में खोया है..?? 
धीरे हॉर्न बजा रे पगले...
'देश' का हिन्दू सोया है...!!!

'राजनीति' की इन सड़कों पर...
सभी 'हवा' में चलते हैं...!!
फुटपाथों पर 'जो' चढ़ जाते...
वो 'सलमान' निकलते हैं...!!
मेरे देश की लचर विधि से...
'भला' सभी का होया है...!!
धीरे हॉर्न बजा रे पगले....
'देश' का हिन्दू सोया है

मेरा हिन्दू है 'सिंह' सरीखा
सोये तब तक सोने दे
'राजनीति' की इन सड़कों पर
नित 'दुर्घटना' होने दे..
देश जगाने की हठ में तू.
क्यूँ दुख में रोया है.
धीरे हॉर्न बजा रे पगले..
देश' का हिन्दू सोया है.

अगर देश यह 'जाग' गया तो
जग 'सीधा' हो जाएगा
पाक चीन 'चुप' हो जाएँगे.
और 'बंगला देश रो जायेगा
राजनीति से 'शर्मसार' हो .
'जन-गण-मन' भी रोया है.
धीरे हॉर्न बजा रे पगले.
देश का हिन्दू सोया है।

🙏वंदे मातरम्🙏
आप का तिवारी परिवार 

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

कांग्रेस ने जिस हिन्दू को सेकुलर का पाठ पढ़ाते पढ़ाते 70 सालों से गुमराह किया वह हिन्दू राष्ट्र भगत कैसे हो गया


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कोंग्रेस वामपंथीयो का असली पेटदर्द इस बात का है कि साला जिस हिन्दू को इन्होंने 70 वर्ष तक पेटभरे मुद्दों में उलझाए रखा वो अचानक धर्म और राष्ट्र के लिए इस हद तक कैसे मुखर होगया। जिस हिन्दू को कोंग्रेस वामपंथी ओर जेहादी मिलकर पेटभरे मुद्दों में उलझा कर उसी के वोट से उसी को निपटाते रहे पर उसे पता तक नही चलने दिया वो आखिर अचानक पेट भरे मुद्दों को छोड़ राष्ट्रवाद के लिए सड़कों पर कैसे उतर ने लगा ,बस यही देखकर कोंग्रेस वामपंथी ओर जेहादी मिशनरियो को अपना भविष्य और भविष्य के बनाए षड्यंत्र फेल होते दिख रहे है और यही कारण है ये लोग तिलमिला उठे है।

संगठित हिन्दू कोंग्रेस वामपंथ मिसनरी ओर जेहादियो के लिए यमराज साबित होगा ये बात कोंग्रेस सहित पूरी देश विरोधी जमात जानती है ,ओर यही कारण है ये लोग हर स्तर पर अपने मोर्चे खोलने को मजबूर हो चुके है इन्हें पता है अगर हिन्दू इसी तरह राष्ट्र और धर्म के लिए संगठित होता रहा तो इनका अंत निश्चित है।

हिन्दुओ चिंता मत करो अब हर लड़ाई में विजय निश्चित है,दुश्मनों के ये सामूहिक हमले ,हिन्दू की बढ़ती ताकत की निशानी है,आज ये सब मिलकर भी हिन्दुओ को परास्त नही कर पा रहे है ,ये थोड़े दिन ओर तिमिलाएँगे ओर फिर सनातन हिन्दू के सामने सरेंडर करने पर मजबूर होंगे।

हिन्दुओ इसी तरह संगठित ओर समरस होते रहो, हम एक दिन पुनः भारत माता को विश्वगुरू के पद पर आसीन कर के रहेंगे और भगवा दुनिया का सिरमौर बन के रहेगा।

कोंग्रेस जेहादी वामपंथी मिसनरी के षडयंत्रो की चिंता छोड़ो ओर चिंतन करो संगठित रहो में हिन्दू हु  ,ये भारत भूमि मेरी माँ है और सनातन धर्म हमारा जीवन का आधार है इस भाव के साथ डटे रहो विजय निश्चित है।
आगे  आप लोग  खुद ही  समझदार हैं  
आप का तिवारी परिवार 

बुधवार, 4 दिसंबर 2019

रामाएण मे कलइउग के बारें में जानकारी


Image result for hinduमित्रो आज हम आपको कलयुग के गुण और अवगुण बतायेंगे, रामचरितमानस के उत्तरकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कलयुग का बहुत सटीक वर्णन किया है, लेकिन इससे पहले जानिए कलयुग क्या है?

कलयुग क्या है ? 

कलयुग का सीधा सा अर्थ है कलह। जहाँ भी कलह है वहां पर कलयुग है। जब भगवान श्री कृष्ण जी अपनी लीला करके अपने लोक में चले गए थे उसी समय से द्वापर युग खत्म हो गया था और कलयुग का आगमन हो गया है।

कलयुग कितने साल का है। हमारे शास्त्रों में बताया गया है की कलयुग 4,32,000 वर्ष तक रहेगा। जिसकी गणना इस प्रकार की गई है।

पुराण के मुताबिक मानव का एक वर्ष देवताओं के एक अहोरात्र यानी दिन-रात के बराबर है। जिसमें उत्तरायण दिन व दक्षिणायन रात मानी जाती है। दरअसल, एक सूर्य संक्रान्ति से दूसरी सूर्य संक्रान्ति की अवधि सौर मास कहलाती है। मानव गणना के ऐसे 12 सौर मासों का 1 सौर वर्ष ही देवताओं का एक अहोरात्र होता है। ऐसे ही 30 अहोरात्र, देवताओं के एक माह और 12 मास एक दिव्य वर्ष कहलाता है।

देवताओं के इन दिव्य वर्षो के आधार पर चार युगों की मानव सौर वर्षों में अवधि इस तरह है,

सतयुग 4800 (दिव्य वर्ष) 17,28,000 (सौर वर्ष)
त्रेतायुग 3600 (दिव्य वर्ष) 12,96,100 (सौर वर्ष)
द्वापरयुग 2400 (दिव्य वर्ष) 8,64,000 (सौर वर्ष)
कलियुग 1200 (दिव्य वर्ष) 4,32,000 (सौर वर्ष)

उस समय घोर कलयुग आएगा जिस समय माँ गंगा और गोवर्धन पर्वत लुप्त हो जायेंगे। क्योंकि इन दोनों को श्राप है। पढ़िए इस कलयुग में क्या-क्या घटित होगा।

 कलयुग के अवगुण और लक्षण,,,,

श्री तुलसीदासकृत रामचरतिमानस में इसका वर्णन आया है। काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी को बता रहे हैं कलयुग के लक्षण और प्रभाव-

नर-नारी पापपरायण (पापों में लिप्त) रहेंगें॥ कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सद्ग्रंथ लुप्त हो गए, दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत से पंथ प्रकट कर दिए॥ सभी लोग मोह के वश हो गए, शुभ कर्मों को लोभ ने हड़प लिया।

कलियुग में न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेद के विरोध में लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता॥ जिसको जो अच्छा लग जाए, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पंडित है। जो मिथ्या आरंभ करता (आडंबर रचता) है और जो दंभ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं॥

जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है॥

जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है॥

जो अमंगल वेष और अमंगल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य-भक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य) सब कुछ खा लेते हैं वे ही योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुग में पूज्य हैं॥

जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं॥

सभी मनुष्य स्त्रियों के विशेष वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह (उनके नचाए) नाचते हैं। ब्राह्मणों को शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गले में जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं॥

सभी पुरुष काम और लोभ में तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतों के विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणों के धाम सुंदर पति को छोड़कर पर पुरुष का सेवन करती हैं॥

सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणों से रहित होती हैं, पर विधवाओं के नित्य नए श्रृंगार होते हैं।

शिष्य और गुरु में बहरे और अंधे का सा हिसाब होता है। एक (शिष्य) गुरु के उपदेश को सुनता नहीं, एक (गुरु) देखता नहीं (उसे ज्ञानदृष्टि) प्राप्त नहीं है)॥

जो गुरु शिष्य का धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरक में पड़ता है। माता-पिता बालकों को बुलाकर वही धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे॥

स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञान के सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों (बहुत थोड़े लाभ) के लिए ब्राह्मण और गुरु की हत्या कर डालते हैं॥

शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं (और कहते हैं) कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्म को जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। (ऐसा कहकर) वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं॥

संत जन बताते हैं की यहाँ शुद्र का मतलब किसी जाति से नहीं बल्कि नीच आचरण करने वाले से है। और ब्राह्मण का अर्थ जो मन कर्म वचन से किसी का बुरा नही करता और जीव मात्र में परमात्मा का दर्शन करके उसकी(परमात्मा) भक्ति करता है।

जो पराई स्त्री में आसक्त, कपट करने में चतुर और मोह, द्रोह और ममता में लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेदवादी (ब्रह्म और जीव को एक बताने वाले) ज्ञानी हैं। मैंने उस कलियुग का यह चरित्र देखा॥

वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं, जो कहीं सन्मार्ग का प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं। जो तर्क करके वेद की निंदा करते हैं, वे लोग कल्प-कल्पभर एक-एक नरक में पड़े रहते हैं॥

तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्ण में नीचे हैं, स्त्री के मरने पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं॥

वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जाति की व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं॥

शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यास गद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता॥

कलियुग में सब लोग वर्णसंकर और मर्यादा से च्युत हो गए। वे पाप करते हैं और (उनके फलस्वरूप) दुःख, भय, रोग, शोक और (प्रिय वस्तु का) वियोग पाते हैं॥

वेद सम्मत तथा वैराग्य और ज्ञान से युक्त जो हरिभक्ति का मार्ग है, मोहवश मनुष्य उस पर नहीं चलते और अनेकों नए-नए पंथों की कल्पना करते हैं॥

संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुग की लीला कुछ कही नहीं जाती॥

कुलवती और सती स्त्री को पुरुष घर से निकाल देते हैं और अच्छी चाल को छोड़कर घर में दासी को ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिता को तभी तक मानते हैं, जब तक स्त्री का मुँह नहीं दिखाई पड़ता॥

जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए। राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही (बिना अपराध) दंड देकर उसकी विडंबना (दुर्दशा) किया करते हैं॥

धनी लोग मलिन (नीच जाति के) होने पर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विज का चिह्न जनेऊ मात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वी का। जो वेदों और पुराणों को नहीं मानते, कलियुग में वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं॥

कवियों के तो झुंड हो गए, पर दुनिया में उदार (कवियों का आश्रयदाता) सुनाई नहीं पड़ता। गुण में दोष लगाने वाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं। कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं। अन्न के बिना सब लोग दुःखी होकर मरते हैं॥

कलियुग में कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाखंड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात् काम, क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभर में व्याप्त हो गए (छा गए)॥

मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भाव से करने लगे। देवता (इंद्र) पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं॥

स्त्रियों के बाल ही भूषण हैं (उनके शरीर पर कोई आभूषण नहीं रह गया) और उनको भूख बहुत लगती है (अर्थात् वे सदा अतृप्त ही रहती हैं)। वे धनहीन और बहुत प्रकार की ममता होने के कारण दुःखी रहती हैं। वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्म में उनका प्रेम नहीं है। बुद्धि थोड़ी है और कठोर है, उनमें कोमलता नहीं है॥

मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्ष का थोड़ा सा जीवन है, परंतु घमंड ऐसा है मानो कल्पांत (प्रलय) होने पर भी उनका नाश नहीं होगा॥

कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगने वाले हो गए॥

ईर्षा (डाह), कडुवे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गई। सब लोग वियोग और विशेष शोक से मरे पड़े हैं। वर्णाश्रम धर्म के आचरण नष्ट हो गए॥

इंद्रियों का दमन, दान, दया और समझदारी किसी में नहीं रही। मूर्खता और दूसरों को ठगना, यह बहुत अधिक बढ़ गया। स्त्री-पुरुष सभी शरीर के ही पालन-पोषण में लगे रहते हैं। जो पराई निंदा करने वाले हैं, जगत् में वे ही फैले हैं॥  

कलिकाल पाप और अवगुणों का घर है, किंतु कलियुग में एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबंधन से छुटकारा मिल जाता है॥ सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार॥

कलियुग केवल नाम अधारा , सुमिर सुमिर नर उतरहि पारा : कलयुग में केवल भगवान का नाम ही भवसागर से पार उतरने का साधन है केवल भगवान का नाम सुमिरन से इस भवसागर से पार पाया जा सकता है।

कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग॥ सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान्‌ के नाम से पा जाते हैं॥

सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं॥ द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं॥ कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा॥

कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है, वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं।

 कलियुग का एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर (मानसिक) पाप नहीं होते॥

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास। गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास॥

यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है, (क्योंकि) इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार (रूपी समुद्र) से तर जाता है॥

शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मन का प्रसन्न होना, इसे सत्ययुग का प्रभाव जानें॥

सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मों में प्रीति हो, सब प्रकार से सुख हो, यह त्रेता का धर्म है।

रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मन में हर्ष और भय हो, यह द्वापर का धर्म है॥

तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर-विरोध हो, यह कलियुग का प्रभाव है।

जिसका श्री रघुनाथजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते।

एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥ 
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥

तुलसीदासजी कहते हैं- इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्री रामजी का ही स्मरण करना, श्री रामजी का ही गुण गाना और निरंतर श्री रामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिए॥

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। कलियुग में राम का नाम कल्पतरु (मन चाहा पदार्थ देने वाला) और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर) है।

और इसके बाद कह दिया केवल कलियुग की ही बात नहीं है, चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं।

राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥ कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात परलोक में भगवान का परमधाम देता है और इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है।)

कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥

भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥

अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है।

इसलिए सब चिंता, भय छोड़कर, मन क्रम और वाणी से भगवान का नाम जपिए और सत्कर्म कीजिये। 
जय   श्री राम 
जय     श्री राम 
आप का तिवारी  परिवार 
जय श्री राम 
जय  राम जी की

रामायण की अति अवयस्क बाते

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तुलसी दास जी ने जब राम चरित मानस की रचना की,तब उनसे किसी ने पूंछा कि बाबा! आप ने इसका नाम रामायण क्यों नहीं रखा? क्योकि इसका नाम रामायण ही है.बस आगे पीछे नाम लगा देते है, वाल्मीकि रामायण,आध्यात्मिक रामायण.आपने राम चरित मानस ही क्यों नाम रखा?
बाबा ने कहा - क्योकि रामायण और राम चरित मानस में एक बहुत बड़ा अंतर है.रामायण का अर्थ है राम का मंदिर, राम का घर,जब हम मंदिर जाते है तो
एक समय पर जाना होता है, मंदिर जाने के लिए नहाना पडता है,जब मंदिर जाते है तो खाली हाथ नहीं जाते कुछ फूल,फल साथ लेकर जाना होता है.मंदिर जाने कि शर्त होती है,मंदिर साफ सुथरा होकर जाया जाता है.
और मानस अर्थात सरोवर, सरोवर में ऐसी कोई शर्त नहीं होती,समय की पाबंधी नहीं होती,जाती का भेद नहीं होता कि केवल हिंदू ही सरोवर में स्नान कर सकता है,कोई भी हो ,कैसा भी हो? और व्यक्ति जब मैला होता है, गन्दा होता है तभी सरोवर में स्नान करने जाता है.माँ की गोद में कभी भी कैसे भी बैठा जा सकता है.
रामचरितमानस की चौपाइयों में ऐसी क्षमता है कि इन चौपाइयों के जप से ही मनुष्य बड़े-से-बड़े संकट में भी मुक्त हो जाता है।
इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग अवश्य करे प्रभु श्रीराम आप के जीवन को सुखमय बना देगे।
1. रक्षा के लिए
मामभिरक्षक रघुकुल नायक |
घृत वर चाप रुचिर कर सायक ||
2. विपत्ति दूर करने के लिए
राजिव नयन धरे धनु सायक |
भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक ||
3. सहायता के लिए
मोरे हित हरि सम नहि कोऊ |
एहि अवसर सहाय सोई होऊ ||
4. सब काम बनाने के लिए
वंदौ बाल रुप सोई रामू |
सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू ||
5. वश मे करने के लिए
सुमिर पवन सुत पावन नामू |
अपने वश कर राखे रामू ||
6. संकट से बचने के लिए
दीन दयालु विरद संभारी |
हरहु नाथ मम संकट भारी ||
7. विघ्न विनाश के लिए
सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही |
राम सुकृपा बिलोकहि जेहि ||
8. रोग विनाश के लिए
राम कृपा नाशहि सव रोगा |
जो यहि भाँति बनहि संयोगा ||
9. ज्वार ताप दूर करने के लिए
दैहिक दैविक भोतिक तापा |
राम राज्य नहि काहुहि व्यापा ||
10. दुःख नाश के लिए
राम भक्ति मणि उस बस जाके |
दुःख लवलेस न सपनेहु ताके ||
11. खोई चीज पाने के लिए
गई बहोरि गरीब नेवाजू |
सरल सबल साहिब रघुराजू ||
12. अनुराग बढाने के लिए
सीता राम चरण रत मोरे |
अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे ||
13. घर मे सुख लाने के लिए
जै सकाम नर सुनहि जे गावहि |
सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं ||
14. सुधार करने के लिए
मोहि सुधारहि सोई सब भाँती |
जासु कृपा नहि कृपा अघाती ||
15. विद्या पाने के लिए
गुरू गृह पढन गए रघुराई |
अल्प काल विधा सब आई ||
16. सरस्वती निवास के लिए
जेहि पर कृपा करहि जन जानी |
कवि उर अजिर नचावहि बानी ||
17. निर्मल बुद्धि के लिए
ताके युग पदं कमल मनाऊँ |
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ ||
18. मोह नाश के लिए
होय विवेक मोह भ्रम भागा |
तब रघुनाथ चरण अनुरागा ||
19. प्रेम बढाने के लिए
सब नर करहिं परस्पर प्रीती |
चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती ||
20. प्रीति बढाने के लिए
बैर न कर काह सन कोई |
जासन बैर प्रीति कर सोई ||
21. सुख प्रप्ति के लिए
अनुजन संयुत भोजन करही |
देखि सकल जननी सुख भरहीं ||
22. भाई का प्रेम पाने के लिए
सेवाहि सानुकूल सब भाई |
राम चरण रति अति अधिकाई ||
23. बैर दूर करने के लिए
बैर न कर काहू सन कोई |
राम प्रताप विषमता खोई ||
24. मेल कराने के लिए
गरल सुधा रिपु करही मिलाई |
गोपद सिंधु अनल सितलाई ||
25. शत्रु नाश के लिए
जाके सुमिरन ते रिपु नासा |
नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा ||
26. रोजगार पाने के लिए
विश्व भरण पोषण करि जोई |
ताकर नाम भरत अस होई ||
27. इच्छा पूरी करने के लिए
राम सदा सेवक रूचि राखी |
वेद पुराण साधु सुर साखी ||
28. पाप विनाश के लिए
पापी जाकर नाम सुमिरहीं |
अति अपार भव भवसागर तरहीं ||
29. अल्प मृत्यु न होने के लिए
अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा |
सब सुन्दर सब निरूज शरीरा ||
30. दरिद्रता दूर के लिए
नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना |
नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना ||
31. प्रभु दर्शन पाने के लिए
अतिशय प्रीति देख रघुवीरा |
प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा ||
32. शोक दूर करने के लिए
नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी |
आए जन्म फल होहिं विशोकी ||
33. क्षमा माँगने के लिए
अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता |
क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता ||
इसलिए जो शुद्ध हो चुके है वे रामायण में चले जाए और जो शुद्ध होना चाहते है वे राम चरित मानस में आ जाए.राम कथा जीवन के दोष मिटाती है
"रामचरित मानस एहिनामा, सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा"
राम चरित मानस तुलसीदास जी ने जब किताब पर ये शब्द लिखे तो आड़े (horizontal) में रामचरितमानस ऐसा नहीं लिखा, खड़े में लिखा (vertical) रामचरित मानस। 

!! जय श्री राम !!
आराम की तलब है तो एक काम करले
आ राम की शरण में और राम राम करले।

लंका से हनुमान जी को शुमेरू परबत से संजीवनी बूटी को लेकर आने कितना समय लगा

#हनुमानजी की उड़ने की गति कितनी थी  #जानिए हनुमानजी की उड़ने की गति कितनी रही होगी उसका अंदाजा आप लगा सकते हैं की रात्रि को 9:00 ...