शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

हिन्दू वो पर हमे सरम आती है डूब मरो धिक्कार है तुम्हारी निद्रा पार और सोते रहो तुम लोग जब तुम्हारी आने वालीं पीडीही तुम से पूछे गी तो तुम क्या जबाब दोगे की तब सेकुलर बनकर सो रहे थे

Image result for hindu


वोटर ID कार्ड पर पड़ा बुर्का आज हट गया

सारे काग़ज़ बाहर निकलने के लिये मचल उठे हैं 

कल रात से ही जुम्मन मियाँ को नींद नहीं आ रही थी । जुम्मन मियाँ के दिल में तूफ़ान उठ रहा था । कल सुबह उनको वोट डालना था और इसकी खुशी उनके दिलो दिमाग़ में उछल कूद मचा रही थी । बड़ी मुश्किल से जुम्मन मियाँ सो पाए थे और सुबह उठते ही उनके दिल में पहला ख्याल यही आया कि आज बीजेपी के खिलाफ वोट डालना है । इस ख्याल ने एक बार फिर उनके ज़ेहन में सिर से पाँव तक सरसरी दौड़ा दी । लिहाज़ा... उन्होंने फौरन अरब की दिशा की तरफ मुंह करके सुबह की नमाज़ अता की और भारत में वोट डालने का अधिकार देने वाले अपने सारे काग़ज़ों की तरफ रुख किया ।

जुम्मन मियाँ ने अपने वोटर आईडी कार्ड को चूम लिया । यही वो काग़ज़ है जिसके बारे में उन्होंने रवीश जी को इंटरव्यू दिया था और बताया था कि उनका कागज तो बाढ़ में बह गया है । यही वो कागज है जिसके बारे में अरफा ने सवाल पूछा था तो उन्होंने जवाब दिया था कि काग़ज़ तो बकरी खा गई और बकरी को काटकर हम खा गए । यही वो कागज था जिसके लिये शाहीन बाग में महीने भर से जिहाद का जलसा चल रहा है । और यही वो काग़ज़ है जो आज वोट देने के लिए मचल रहा था । 

जुम्मन मियाँ को अपने वोटर आईडी कार्ड से उतनी ही मोहब्बत थी जितनी मुगलों के जमाने में बाबर और औरंगजेब को अपनी तलवार से थी । जुम्मन मियाँ आज अपने वोटर आईडी कार्ड को सहला सहला कर धार दे रहे थे । पुरानी और वंशानुगत आदतें इतनी आसानी से जाती भी कहां हैं । 

उसी वक्त उनके दिल में ये ख्याल आया कि आखिर वोट देना किसको है ? ये ख्याल आते ही कि वोट आम आदमी पार्टी को देना है उनका मुँह बहुत कड़वा हो गए । नामुराद.. केजरीवाल.. काफिर... हनुमान चालीसा पढ़ रहा था । बुतपरस्ती इस्लाम में नाक़ाबिले बर्दाश्त है ये सब ख्याल जुम्मन मियाँ को परेशान करने लगे । तभी उनकी रूह के अंदर से आवाज़ उठी.. जो सबसे कम राष्ट्रवादी है सबसे कम देशभक्त है और सबसे ज्यादा मुस्लिम परस्त है उसको वोट देना ही फ़र्ज़ है । 

और फिर अचानक जुम्मन मियां  ख्वाबों की दुनिया में चले गए । उनको मुगल राज नज़र आने लगा । मुगल राज जब आएगा... तब हम सारे वोटर आईडी कार्ड जलवा देंगे.. सारे काग़ज़ कुएँ में फेंकवा देंगे । अचानक ख्वाबों के धुँधलके में मुग़लिया दरबार की महफ़िलें नज़र आने लगी... अनारकली दरबार में नाचने लगीं .. कनीज़ें बोसा करने लगीं। काफिर औरतें बाज़ारों में बिकने लगी । मुश्रिकों की गर्दनें धड़ से उतरने लगीं । धरती डोलने लगी.. आसमान हिलने लगा... रूहें क़ब्रों से उठने लगीं... दरबार सजने लगा... जन्नत नजर आने लगीं.. हूरें गाउन तकिया लगाए उनका इंतज़ार करने लगीं.. तभी अचानक सलमा आ गईं.. उन्होंने ज़ोर से जुम्मन मियाँ को हिलाया और बोला... चलिए वोट देने चलना है किन ख्यालों में खोए हुए हैं ।

जुम्मन मियाँ के ख्वाबों के तार टूट गए । अचानक बुर्के में अपनी बीवी को देखा... कहां वो हूरों का हुस्न.. 72 पर्दों में ढकने के बाद भी नज़र आते लजीज़ अंग प्रत्यंग और कहां... । मियाँ को गुस्सा आ रहा था लेकिन वोट देना जरूरी था । उन्होंने अपनी घड़ी देखी... जो असलम मियाँ उनके लिए दुबई से लाए थे । उस घड़ी को वो दुनिया की सबसे नायाब घड़ी मानते थे । बहरहाल सुबह के आठ बज गए थे । और वो अपने पूरे परिवार के साथ पोलिंग बूथ की तरफ बढ़ चले । उन्होंने अपना वोट डाल दिया है । और उनके मन में कोई शर्मिंदगी भी नहीं है कि वो इतने दिनों से झूठ बोल रहे थे । लेकिन फिर उनको तालीम याद आ गई । काफिरों के खिलाफ की गई चालबाज़ी पर कोई सज़ा नहीं होती.. सिर्फ आपसी भाईचारे में कोई चालबाज़ी नहीं करनी चाहिए ।

इसी हिंदुस्तान में उनके पुरखों ने पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग को वोट डाला था और इसी हिंदुस्तान में आज वो पाकिस्तान परस्त पार्टियों को वोट डालते हैं । बाकी शी शी शी शी... हिंदू सो रहा है.. उसे सोने दो !


सत्यमेव जयते

वसुधैव कुटुम्बकम्

मुझे हिन्दूवो के बारें  में लिखने मे अब सरम आती है 
और क्या लिखूं आप लोग खुद ही समझदार  
आप का तिवारी परिवार  जय हिंद  जय भारत  जय सनातन 

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

हिंदुओं ने विवाह की परंपरा क्यों बदली?

Image result for hindu vivah

#हिन्दुओं में #विवाह #रात्रि में #क्यों #होने #लगे ?

क्या कभी आपने सोचा है कि हिन्दुओं में रात्रि को विवाह क्यों होने लगे हैं, जबकि हिन्दुओं में रात में शुभकार्य करना अच्छा नहीं माना जाता है क्योंकि ये निशाचरी समय होता है ?
  रात को देर तक जागना और सुबह को देर तक सोने को, राक्षसी प्रवृति बताया जाता है। रात में जागने वाले को निशाचर कहते हैं।

केवल तंत्र सिद्धि करने वालों को ही रात्रि में हवन व यज्ञ की अनुमति है।

वैसे भी प्राचीन समय से ही सनातन धर्मी हिन्दू दिन के प्रकाश में ही शुभ कार्य करने के समर्थक रहे हैं। तब हिन्दुओं में रात की विवाह की परम्परा कैसे पड़ी ?

कभी हम अपने पूर्वजों के सामने यह सवाल क्यों नहीं उठाते हैं  या  स्वयं इस प्रश्न का हल क्यों नहीं खोजते हैं ?

दरअसल भारत में सभी उत्सव, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं संस्कार दिन में ही किये जाते थे चूंकि ये सनातनी परम्परा है। सीता और द्रौपदी का स्वयंवर भी दिन में ही हुआ था। शिव विवाह से लेकर संयोगिता स्वयंवर (बाद में पृथ्वीराज चौहान जी द्वारा संयोगिता जी की इच्छा से उनका अपहरण) आदि सभी शुभ कार्यक्रम दिन में ही होते थे।

प्राचीन काल से लेकर मुगलों के आने तक भारत में विवाह दिन में ही हुआ करते थे। मुस्लिम  आक्रमणकारियों के भारत पर हमले करने के बाद ही, हिन्दुओं को अपनी कई प्राचीन परम्पराएं तोड़ने को विवश होना पड़ा था।

मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर अतिक्रमण करने के बाद भारतीयों पर बहुत अत्याचार किये गये। यह आक्रमणकारी  हिन्दुओं के विवाह के समय वहां पहुंचकर लूटपाट मचाते थे। अकबर के शासन काल में, जब अत्याचार चरमसीमा पर थे, मुग़ल सैनिक हिन्दू लड़कियों को बलपूर्वक उठा लेते थे और उन्हें अपने आकाओं को सौंप देते थे।

भारतीय ज्ञात इतिहास में सबसे पहली बार रात्रि में विवाह सुन्दरी और मुंदरी नाम की दो ब्राह्मण बहनों का हुआ था, जिनकी विवाह दुल्ला भट्टी ने अपने संरक्षण में ब्राह्मण युवकों से कराया था।
उस समय दुल्ला भट्टी ने अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाये थे। दुल्ला भट्टी ने ऐसी अनेकों लड़कियों को मुगलों से छुड़ाकर, उनका हिन्दू लड़कों से विवाह कराया।

उसके बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों के आतंक से बचने के लिए हिन्दू रात के अँधेरे में विवाह करने पर मजबूर होने लगे। लेकिन रात्रि में विवाह करते समय भी यह ध्यान रखा जाता है कि ...... नाचना-गाना, दावत, जयमाला, आदि भले ही रात्रि में हो जाए लेकिन वैदिक मन्त्रों के साथ फेरे प्रातः पौ फटने के बाद ही हों।

पंजाब से प्रारम्भ हुई परंपरा को पंजाब में ही समाप्त किया गया।
फिल्लौर से लेकर काबुल तक महाराजा रंजीत सिंह का राज हो जाने के बाद उनके सेनापति हरीसिंह नलवा ने सनातन वैदिक परम्परा अनुसार दिन में खुले आम विवाह करने और उनको सुरक्षा देने की घोषणा की थी। 
हरीसिंह नलवा के संरक्षण में हिन्दुओं ने दिनदहाड़े - बैंडबाजे के साथ विवाह शुरू किये।
तब से पंजाब में फिर से दिन में विवाह का प्रचालन शुरू हुआ। पंजाब में अधिकांश विवाह आज भी दिन में ही होते हैं।
महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, केरल, असम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा एवम् अन्य राज्य भी धीरे धीरे अपनी जड़ों की ओर लोटने लगे हैं। अतः इन प्रदेशों में दिन में विवाह होते हैं।
हरीसिंह नलवा ने मुसलमान बने हिन्दुओं की घर वापसी कराई, मुसलमानों पर जजिया कर लगाया, हिन्दू धर्म की परम्पराओं को फिर से स्थापित किया, इसीलिए उनको “पुष्यमित्र शुंग” का अवतार कहा जाता है।

सभी विवाह सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त ब्रह्ममुहूर्त में ही संपादित किये जाते हैं।  ध्रुवतारा को स्थिरता के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो ब्रह्ममुहूर्त में ही सबसे अच्छा दृष्टिगोचर होता है ।

लेकिन साक्षी सूर्य के प्रतीक स्वरूप अग्नि को ही माना जाता है। इसीलिए अग्नि के ही चारों ओर फेरे लिए जाने की विधि है।

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में रात्रि विवाह का पूर्ण खण्डन किया है।  पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार भी हिन्दू गायत्री परिवार में  विवाह दिन में ही सम्पन्न किये जाते हैं ....!!

आज भी, हम भारत के लोग, खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं बिहार के लोग, जबकि 400 साल हो गए मुगल यहां से चले गए, किन्तु आज भी उसे परंपरा मानकर उसे चला रहे हैं! असल में हम गुलामी की मानसिकता से उबरना ही नहीं चाहते हैं !

आप सभी से विनम्र निवेदन है कि इस प्रथा पर आप सब एक बार अवश्य विचार करें एवं अपनी पुरानी धुरी पर अवश्य वापस लौटें ।
आगे आप लोग  खुद  ही समझदार  है  
आप का तिवारी परिवार 

शनिवार, 25 जनवरी 2020

सोजावो मेंरे देश के हिन्दू समय ना ऐसा दूंजा हैं

Image result for hindu

एक ट्रक के पीछे लिखी ये पंक्ति झकझोर गई..

"हॉर्न धीरे बजाओ मेरा हिन्दूसो रहा है"...

उस पर एक कविता इस प्रकार है कि...

'अँग्रेजों' के जुल्म सितम से,
फूट फूटकर 'रोया' है..
'धीरे' हॉर्न बजा रे पगले  
'देश' का हिन्दू सोया है।

आजादी संग 'चैन' मिला है
'पूरी' नींद से सोने दे...!!
जगह मिले वहाँ 'साइड' ले ले...
हो 'दुर्घटना' तो होने दे...!!
किसे 'बचाने' की चिंता में...
 तू इतना जो 'खोया' है...!!
'धीरे' हॉर्न बजा रे पगले ...
'देश' का हिन्दू सोया है....!!!

ट्रैफिक के सब 'नियम' पड़े हैं...
कब से 'बंद' किताबों में...!!
'जिम्मेदार' सुरक्षा वाले...
सारे लगे 'हिसाबों' में...!!
तू भी पकड़ा 'सौ' की पत्ती...
क्यों 'ईमान' में खोया है..?? 
धीरे हॉर्न बजा रे पगले...
'देश' का हिन्दू सोया है...!!!

'राजनीति' की इन सड़कों पर...
सभी 'हवा' में चलते हैं...!!
फुटपाथों पर 'जो' चढ़ जाते...
वो 'सलमान' निकलते हैं...!!
मेरे देश की लचर विधि से...
'भला' सभी का होया है...!!
धीरे हॉर्न बजा रे पगले....
'देश' का हिन्दू सोया है

मेरा हिन्दू है 'सिंह' सरीखा
सोये तब तक सोने दे
'राजनीति' की इन सड़कों पर
नित 'दुर्घटना' होने दे..
देश जगाने की हठ में तू.
क्यूँ दुख में रोया है.
धीरे हॉर्न बजा रे पगले..
देश' का हिन्दू सोया है.

अगर देश यह 'जाग' गया तो
जग 'सीधा' हो जाएगा
पाक चीन 'चुप' हो जाएँगे.
और 'बंगला देश रो जायेगा
राजनीति से 'शर्मसार' हो .
'जन-गण-मन' भी रोया है.
धीरे हॉर्न बजा रे पगले.
देश का हिन्दू सोया है।

🙏वंदे मातरम्🙏
आप का तिवारी परिवार 

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

कांग्रेस ने जिस हिन्दू को सेकुलर का पाठ पढ़ाते पढ़ाते 70 सालों से गुमराह किया वह हिन्दू राष्ट्र भगत कैसे हो गया


Image result for hindu
कोंग्रेस वामपंथीयो का असली पेटदर्द इस बात का है कि साला जिस हिन्दू को इन्होंने 70 वर्ष तक पेटभरे मुद्दों में उलझाए रखा वो अचानक धर्म और राष्ट्र के लिए इस हद तक कैसे मुखर होगया। जिस हिन्दू को कोंग्रेस वामपंथी ओर जेहादी मिलकर पेटभरे मुद्दों में उलझा कर उसी के वोट से उसी को निपटाते रहे पर उसे पता तक नही चलने दिया वो आखिर अचानक पेट भरे मुद्दों को छोड़ राष्ट्रवाद के लिए सड़कों पर कैसे उतर ने लगा ,बस यही देखकर कोंग्रेस वामपंथी ओर जेहादी मिशनरियो को अपना भविष्य और भविष्य के बनाए षड्यंत्र फेल होते दिख रहे है और यही कारण है ये लोग तिलमिला उठे है।

संगठित हिन्दू कोंग्रेस वामपंथ मिसनरी ओर जेहादियो के लिए यमराज साबित होगा ये बात कोंग्रेस सहित पूरी देश विरोधी जमात जानती है ,ओर यही कारण है ये लोग हर स्तर पर अपने मोर्चे खोलने को मजबूर हो चुके है इन्हें पता है अगर हिन्दू इसी तरह राष्ट्र और धर्म के लिए संगठित होता रहा तो इनका अंत निश्चित है।

हिन्दुओ चिंता मत करो अब हर लड़ाई में विजय निश्चित है,दुश्मनों के ये सामूहिक हमले ,हिन्दू की बढ़ती ताकत की निशानी है,आज ये सब मिलकर भी हिन्दुओ को परास्त नही कर पा रहे है ,ये थोड़े दिन ओर तिमिलाएँगे ओर फिर सनातन हिन्दू के सामने सरेंडर करने पर मजबूर होंगे।

हिन्दुओ इसी तरह संगठित ओर समरस होते रहो, हम एक दिन पुनः भारत माता को विश्वगुरू के पद पर आसीन कर के रहेंगे और भगवा दुनिया का सिरमौर बन के रहेगा।

कोंग्रेस जेहादी वामपंथी मिसनरी के षडयंत्रो की चिंता छोड़ो ओर चिंतन करो संगठित रहो में हिन्दू हु  ,ये भारत भूमि मेरी माँ है और सनातन धर्म हमारा जीवन का आधार है इस भाव के साथ डटे रहो विजय निश्चित है।
आगे  आप लोग  खुद ही  समझदार हैं  
आप का तिवारी परिवार 

बुधवार, 4 दिसंबर 2019

रामाएण मे कलइउग के बारें में जानकारी


Image result for hinduमित्रो आज हम आपको कलयुग के गुण और अवगुण बतायेंगे, रामचरितमानस के उत्तरकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कलयुग का बहुत सटीक वर्णन किया है, लेकिन इससे पहले जानिए कलयुग क्या है?

कलयुग क्या है ? 

कलयुग का सीधा सा अर्थ है कलह। जहाँ भी कलह है वहां पर कलयुग है। जब भगवान श्री कृष्ण जी अपनी लीला करके अपने लोक में चले गए थे उसी समय से द्वापर युग खत्म हो गया था और कलयुग का आगमन हो गया है।

कलयुग कितने साल का है। हमारे शास्त्रों में बताया गया है की कलयुग 4,32,000 वर्ष तक रहेगा। जिसकी गणना इस प्रकार की गई है।

पुराण के मुताबिक मानव का एक वर्ष देवताओं के एक अहोरात्र यानी दिन-रात के बराबर है। जिसमें उत्तरायण दिन व दक्षिणायन रात मानी जाती है। दरअसल, एक सूर्य संक्रान्ति से दूसरी सूर्य संक्रान्ति की अवधि सौर मास कहलाती है। मानव गणना के ऐसे 12 सौर मासों का 1 सौर वर्ष ही देवताओं का एक अहोरात्र होता है। ऐसे ही 30 अहोरात्र, देवताओं के एक माह और 12 मास एक दिव्य वर्ष कहलाता है।

देवताओं के इन दिव्य वर्षो के आधार पर चार युगों की मानव सौर वर्षों में अवधि इस तरह है,

सतयुग 4800 (दिव्य वर्ष) 17,28,000 (सौर वर्ष)
त्रेतायुग 3600 (दिव्य वर्ष) 12,96,100 (सौर वर्ष)
द्वापरयुग 2400 (दिव्य वर्ष) 8,64,000 (सौर वर्ष)
कलियुग 1200 (दिव्य वर्ष) 4,32,000 (सौर वर्ष)

उस समय घोर कलयुग आएगा जिस समय माँ गंगा और गोवर्धन पर्वत लुप्त हो जायेंगे। क्योंकि इन दोनों को श्राप है। पढ़िए इस कलयुग में क्या-क्या घटित होगा।

 कलयुग के अवगुण और लक्षण,,,,

श्री तुलसीदासकृत रामचरतिमानस में इसका वर्णन आया है। काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी को बता रहे हैं कलयुग के लक्षण और प्रभाव-

नर-नारी पापपरायण (पापों में लिप्त) रहेंगें॥ कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सद्ग्रंथ लुप्त हो गए, दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत से पंथ प्रकट कर दिए॥ सभी लोग मोह के वश हो गए, शुभ कर्मों को लोभ ने हड़प लिया।

कलियुग में न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेद के विरोध में लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता॥ जिसको जो अच्छा लग जाए, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पंडित है। जो मिथ्या आरंभ करता (आडंबर रचता) है और जो दंभ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं॥

जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है॥

जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है॥

जो अमंगल वेष और अमंगल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य-भक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य) सब कुछ खा लेते हैं वे ही योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुग में पूज्य हैं॥

जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं॥

सभी मनुष्य स्त्रियों के विशेष वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह (उनके नचाए) नाचते हैं। ब्राह्मणों को शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गले में जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं॥

सभी पुरुष काम और लोभ में तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतों के विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणों के धाम सुंदर पति को छोड़कर पर पुरुष का सेवन करती हैं॥

सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणों से रहित होती हैं, पर विधवाओं के नित्य नए श्रृंगार होते हैं।

शिष्य और गुरु में बहरे और अंधे का सा हिसाब होता है। एक (शिष्य) गुरु के उपदेश को सुनता नहीं, एक (गुरु) देखता नहीं (उसे ज्ञानदृष्टि) प्राप्त नहीं है)॥

जो गुरु शिष्य का धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरक में पड़ता है। माता-पिता बालकों को बुलाकर वही धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे॥

स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञान के सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों (बहुत थोड़े लाभ) के लिए ब्राह्मण और गुरु की हत्या कर डालते हैं॥

शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं (और कहते हैं) कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्म को जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। (ऐसा कहकर) वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं॥

संत जन बताते हैं की यहाँ शुद्र का मतलब किसी जाति से नहीं बल्कि नीच आचरण करने वाले से है। और ब्राह्मण का अर्थ जो मन कर्म वचन से किसी का बुरा नही करता और जीव मात्र में परमात्मा का दर्शन करके उसकी(परमात्मा) भक्ति करता है।

जो पराई स्त्री में आसक्त, कपट करने में चतुर और मोह, द्रोह और ममता में लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेदवादी (ब्रह्म और जीव को एक बताने वाले) ज्ञानी हैं। मैंने उस कलियुग का यह चरित्र देखा॥

वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं, जो कहीं सन्मार्ग का प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं। जो तर्क करके वेद की निंदा करते हैं, वे लोग कल्प-कल्पभर एक-एक नरक में पड़े रहते हैं॥

तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्ण में नीचे हैं, स्त्री के मरने पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं॥

वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जाति की व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं॥

शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यास गद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता॥

कलियुग में सब लोग वर्णसंकर और मर्यादा से च्युत हो गए। वे पाप करते हैं और (उनके फलस्वरूप) दुःख, भय, रोग, शोक और (प्रिय वस्तु का) वियोग पाते हैं॥

वेद सम्मत तथा वैराग्य और ज्ञान से युक्त जो हरिभक्ति का मार्ग है, मोहवश मनुष्य उस पर नहीं चलते और अनेकों नए-नए पंथों की कल्पना करते हैं॥

संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुग की लीला कुछ कही नहीं जाती॥

कुलवती और सती स्त्री को पुरुष घर से निकाल देते हैं और अच्छी चाल को छोड़कर घर में दासी को ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिता को तभी तक मानते हैं, जब तक स्त्री का मुँह नहीं दिखाई पड़ता॥

जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए। राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही (बिना अपराध) दंड देकर उसकी विडंबना (दुर्दशा) किया करते हैं॥

धनी लोग मलिन (नीच जाति के) होने पर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विज का चिह्न जनेऊ मात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वी का। जो वेदों और पुराणों को नहीं मानते, कलियुग में वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं॥

कवियों के तो झुंड हो गए, पर दुनिया में उदार (कवियों का आश्रयदाता) सुनाई नहीं पड़ता। गुण में दोष लगाने वाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं। कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं। अन्न के बिना सब लोग दुःखी होकर मरते हैं॥

कलियुग में कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाखंड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात् काम, क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभर में व्याप्त हो गए (छा गए)॥

मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भाव से करने लगे। देवता (इंद्र) पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं॥

स्त्रियों के बाल ही भूषण हैं (उनके शरीर पर कोई आभूषण नहीं रह गया) और उनको भूख बहुत लगती है (अर्थात् वे सदा अतृप्त ही रहती हैं)। वे धनहीन और बहुत प्रकार की ममता होने के कारण दुःखी रहती हैं। वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्म में उनका प्रेम नहीं है। बुद्धि थोड़ी है और कठोर है, उनमें कोमलता नहीं है॥

मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्ष का थोड़ा सा जीवन है, परंतु घमंड ऐसा है मानो कल्पांत (प्रलय) होने पर भी उनका नाश नहीं होगा॥

कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगने वाले हो गए॥

ईर्षा (डाह), कडुवे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गई। सब लोग वियोग और विशेष शोक से मरे पड़े हैं। वर्णाश्रम धर्म के आचरण नष्ट हो गए॥

इंद्रियों का दमन, दान, दया और समझदारी किसी में नहीं रही। मूर्खता और दूसरों को ठगना, यह बहुत अधिक बढ़ गया। स्त्री-पुरुष सभी शरीर के ही पालन-पोषण में लगे रहते हैं। जो पराई निंदा करने वाले हैं, जगत् में वे ही फैले हैं॥  

कलिकाल पाप और अवगुणों का घर है, किंतु कलियुग में एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबंधन से छुटकारा मिल जाता है॥ सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार॥

कलियुग केवल नाम अधारा , सुमिर सुमिर नर उतरहि पारा : कलयुग में केवल भगवान का नाम ही भवसागर से पार उतरने का साधन है केवल भगवान का नाम सुमिरन से इस भवसागर से पार पाया जा सकता है।

कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग॥ सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान्‌ के नाम से पा जाते हैं॥

सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं॥ द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं॥ कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा॥

कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है, वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं।

 कलियुग का एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर (मानसिक) पाप नहीं होते॥

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास। गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास॥

यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है, (क्योंकि) इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार (रूपी समुद्र) से तर जाता है॥

शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मन का प्रसन्न होना, इसे सत्ययुग का प्रभाव जानें॥

सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मों में प्रीति हो, सब प्रकार से सुख हो, यह त्रेता का धर्म है।

रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मन में हर्ष और भय हो, यह द्वापर का धर्म है॥

तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर-विरोध हो, यह कलियुग का प्रभाव है।

जिसका श्री रघुनाथजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते।

एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥ 
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥

तुलसीदासजी कहते हैं- इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्री रामजी का ही स्मरण करना, श्री रामजी का ही गुण गाना और निरंतर श्री रामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिए॥

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। कलियुग में राम का नाम कल्पतरु (मन चाहा पदार्थ देने वाला) और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर) है।

और इसके बाद कह दिया केवल कलियुग की ही बात नहीं है, चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं।

राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥ कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात परलोक में भगवान का परमधाम देता है और इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है।)

कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥

भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥

अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है।

इसलिए सब चिंता, भय छोड़कर, मन क्रम और वाणी से भगवान का नाम जपिए और सत्कर्म कीजिये। 
जय   श्री राम 
जय     श्री राम 
आप का तिवारी  परिवार 
जय श्री राम 
जय  राम जी की

रामायण की अति अवयस्क बाते

*************************************
तुलसी दास जी ने जब राम चरित मानस की रचना की,तब उनसे किसी ने पूंछा कि बाबा! आप ने इसका नाम रामायण क्यों नहीं रखा? क्योकि इसका नाम रामायण ही है.बस आगे पीछे नाम लगा देते है, वाल्मीकि रामायण,आध्यात्मिक रामायण.आपने राम चरित मानस ही क्यों नाम रखा?
बाबा ने कहा - क्योकि रामायण और राम चरित मानस में एक बहुत बड़ा अंतर है.रामायण का अर्थ है राम का मंदिर, राम का घर,जब हम मंदिर जाते है तो
एक समय पर जाना होता है, मंदिर जाने के लिए नहाना पडता है,जब मंदिर जाते है तो खाली हाथ नहीं जाते कुछ फूल,फल साथ लेकर जाना होता है.मंदिर जाने कि शर्त होती है,मंदिर साफ सुथरा होकर जाया जाता है.
और मानस अर्थात सरोवर, सरोवर में ऐसी कोई शर्त नहीं होती,समय की पाबंधी नहीं होती,जाती का भेद नहीं होता कि केवल हिंदू ही सरोवर में स्नान कर सकता है,कोई भी हो ,कैसा भी हो? और व्यक्ति जब मैला होता है, गन्दा होता है तभी सरोवर में स्नान करने जाता है.माँ की गोद में कभी भी कैसे भी बैठा जा सकता है.
रामचरितमानस की चौपाइयों में ऐसी क्षमता है कि इन चौपाइयों के जप से ही मनुष्य बड़े-से-बड़े संकट में भी मुक्त हो जाता है।
इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग अवश्य करे प्रभु श्रीराम आप के जीवन को सुखमय बना देगे।
1. रक्षा के लिए
मामभिरक्षक रघुकुल नायक |
घृत वर चाप रुचिर कर सायक ||
2. विपत्ति दूर करने के लिए
राजिव नयन धरे धनु सायक |
भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक ||
3. सहायता के लिए
मोरे हित हरि सम नहि कोऊ |
एहि अवसर सहाय सोई होऊ ||
4. सब काम बनाने के लिए
वंदौ बाल रुप सोई रामू |
सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू ||
5. वश मे करने के लिए
सुमिर पवन सुत पावन नामू |
अपने वश कर राखे रामू ||
6. संकट से बचने के लिए
दीन दयालु विरद संभारी |
हरहु नाथ मम संकट भारी ||
7. विघ्न विनाश के लिए
सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही |
राम सुकृपा बिलोकहि जेहि ||
8. रोग विनाश के लिए
राम कृपा नाशहि सव रोगा |
जो यहि भाँति बनहि संयोगा ||
9. ज्वार ताप दूर करने के लिए
दैहिक दैविक भोतिक तापा |
राम राज्य नहि काहुहि व्यापा ||
10. दुःख नाश के लिए
राम भक्ति मणि उस बस जाके |
दुःख लवलेस न सपनेहु ताके ||
11. खोई चीज पाने के लिए
गई बहोरि गरीब नेवाजू |
सरल सबल साहिब रघुराजू ||
12. अनुराग बढाने के लिए
सीता राम चरण रत मोरे |
अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे ||
13. घर मे सुख लाने के लिए
जै सकाम नर सुनहि जे गावहि |
सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं ||
14. सुधार करने के लिए
मोहि सुधारहि सोई सब भाँती |
जासु कृपा नहि कृपा अघाती ||
15. विद्या पाने के लिए
गुरू गृह पढन गए रघुराई |
अल्प काल विधा सब आई ||
16. सरस्वती निवास के लिए
जेहि पर कृपा करहि जन जानी |
कवि उर अजिर नचावहि बानी ||
17. निर्मल बुद्धि के लिए
ताके युग पदं कमल मनाऊँ |
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ ||
18. मोह नाश के लिए
होय विवेक मोह भ्रम भागा |
तब रघुनाथ चरण अनुरागा ||
19. प्रेम बढाने के लिए
सब नर करहिं परस्पर प्रीती |
चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती ||
20. प्रीति बढाने के लिए
बैर न कर काह सन कोई |
जासन बैर प्रीति कर सोई ||
21. सुख प्रप्ति के लिए
अनुजन संयुत भोजन करही |
देखि सकल जननी सुख भरहीं ||
22. भाई का प्रेम पाने के लिए
सेवाहि सानुकूल सब भाई |
राम चरण रति अति अधिकाई ||
23. बैर दूर करने के लिए
बैर न कर काहू सन कोई |
राम प्रताप विषमता खोई ||
24. मेल कराने के लिए
गरल सुधा रिपु करही मिलाई |
गोपद सिंधु अनल सितलाई ||
25. शत्रु नाश के लिए
जाके सुमिरन ते रिपु नासा |
नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा ||
26. रोजगार पाने के लिए
विश्व भरण पोषण करि जोई |
ताकर नाम भरत अस होई ||
27. इच्छा पूरी करने के लिए
राम सदा सेवक रूचि राखी |
वेद पुराण साधु सुर साखी ||
28. पाप विनाश के लिए
पापी जाकर नाम सुमिरहीं |
अति अपार भव भवसागर तरहीं ||
29. अल्प मृत्यु न होने के लिए
अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा |
सब सुन्दर सब निरूज शरीरा ||
30. दरिद्रता दूर के लिए
नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना |
नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना ||
31. प्रभु दर्शन पाने के लिए
अतिशय प्रीति देख रघुवीरा |
प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा ||
32. शोक दूर करने के लिए
नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी |
आए जन्म फल होहिं विशोकी ||
33. क्षमा माँगने के लिए
अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता |
क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता ||
इसलिए जो शुद्ध हो चुके है वे रामायण में चले जाए और जो शुद्ध होना चाहते है वे राम चरित मानस में आ जाए.राम कथा जीवन के दोष मिटाती है
"रामचरित मानस एहिनामा, सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा"
राम चरित मानस तुलसीदास जी ने जब किताब पर ये शब्द लिखे तो आड़े (horizontal) में रामचरितमानस ऐसा नहीं लिखा, खड़े में लिखा (vertical) रामचरित मानस। 

!! जय श्री राम !!
आराम की तलब है तो एक काम करले
आ राम की शरण में और राम राम करले।

शनिवार, 23 नवंबर 2019

मृत्यु ही एक सत्य है

Image result for death

विचार करों 
#मृत्यु से भय #क्यों – राजा #परीक्षित की कथा
राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनातें हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और तक्षक ( सर्प ) के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, 

तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु का भय दूर नहीं हुआ। अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था। 
तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।

राजन ! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। 

संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि पड़ गई और भारी वर्षा पड़ने लगी।

 जंगल में सिंह व्याघ्र आदि बोलने लगे। वह राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा।

रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बहेलिये की झोंपड़ी देखी ।

 वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। 

अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। 

बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त वह झोंपड़ी थी।

Image result for death

उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका, लेकिन पीछे उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की।

बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं। 
मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं। 

इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने की कोशिश करते हैं एवं अपना कब्जा जमाते हैं। 
ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ।। इसलिए मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता। मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा।

राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह सुबह होते ही इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा।
 उसका काम तो बहुत बड़ा है, यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है, सिर्फ एक रात्रि ही काटनी है।
बहेलिये ने राजा को ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दोहरा दिया।
राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा। सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सुबह उठा तो वही सब परमप्रिय लगने लगा। 
अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास करने की बात सोचने लगा।
वह बहेलिये से और ठहरने की प्रार्थना करने लगा। इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा कहने लगा।
 राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित से पूछा," परीक्षित ! बताओ, उस राजा का उस स्थान पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था ? 
परीक्षित ने उत्तर दिया," भगवन् ! वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइये ? 
वह तो बड़ा भारी मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता है। 
उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है। "
श्री शुकदेव जी महाराज ने कहा," हे राजा परीक्षित ! वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं।
 इस मल-मूल की गठरी देह ( शरीर ) में जितने समय आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, 
वह अवधि तो कल समाप्त हो रही है। अब आपको उस लोक जाना है, जहाँ से आप आएं हैं।

 फिर भी आप झंझट फैला रहे हैं और मरना नहीं चाहते। क्या यह आपकी मूर्खता नहीं है ?

राजा परीक्षित का ज्ञान जाग पड़ा और वे बंधन मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए।
जब एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है तो अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना करता है

 कि हे भगवन् ! मुझे यहाँ ( इस कोख ) से मुक्त कीजिए, मैं आपका भजन-सुमिरन करूँगा। और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो ( उस राजा की तरह हैरान होकर ) सोचने लगता है कि मैं ये कहाँ आ गया 
( और पैदा होते ही रोने लगता है ) फिर उस गंध से भरी झोंपड़ी की तरह उसे यहाँ की खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है|
     
*🙏मानो या ना मानो हम सब की यही कहानी। कोई माने कोई नहीं, जीवन की यही सच्चाई - जय जय श्रीराधे जय श्रीकृष्ण तो प्रेम से बोल ड़ो एकबार - आपके कमल के मोर मुकुट बंशीवाले के लिये -*....
आप का तिवारी  परिवार  जय श्री राधे राधे  जय श्री कृष्ण 

बुधवार, 20 नवंबर 2019

JNU बना जहन्नुम

यह जेएनयू में रिसर्च कर रहे @sandip k luis है लुई सरनेम से यह मत सोचिए गा कि कोई आस्ट्रेलिया अमेरिका या ब्रिटेन से मिस्टर लुईसा की पैदाइश है बल्कि यह पैसे की लालच में एक कन्वर्टेड ईसाई है और यह खुद प्राइवेट यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर पर काम कर चुके है और यह हॉस्टल की फीस ₹300 किए जाने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे है...
अब दूसरी बात आप इसके फेसबुक पर जा कर देखिए इसने अपनी कवर पिक जो लगाई है उसमें भारतीय सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस पर पत्थरबाजी करने को उकसा रहा है और हिंदू देवी देवताओं के बहुत से अश्लील फोटो पोस्ट किए हुए हैं...
वैसे इस आम छात्र के हितों में चल रही फीस वृद्धि के खिलाफ लड़ाई में देश के हर छात्र की सिम्पैथी है कि उच्च शिक्षा सस्ती हो लेकिन इस आंदोलन की आड़ में जब आप अपने विषाक्त विचारो को फैलाने के लिए, आम छात्रों को बरगलाने के लिए, देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए अपनी फौज तैयार करने लगते हो तो वही वही आपकी मंशा जाहिर हो जाती है! 
आप ऐसे आंदोलनों की आड़ में हमारे देश की संस्कृति उसकी सुचिता अस्मिता उसकी विरासत से खिलवाड़ करने का प्रयास करते हो तो वही तुम्हारी मानसिक गुलामी जाहिर हो जाती है और तुम्हारे इन नापाक मंसूबो को इस देश का एक एक छात्र/ नागरिक समझ चुका है जिसे वो कभी कामयाब नही होने देगा....
आप का का तिवारी  परिवार

Image result for jnu

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

काल भैरव शिव परिवार का एक अभिन्न अंग है

Image result for kaal bhairav

सुप्रभात मित्रों ... ॐ नमः शिवाय!
आज का दिन आप सभी के लिये शुभ हो।

                💖भैरव अष्टमी💖

☸ इसी माह दिनांक 19 को भैरव अष्टमी है।
भैरव का नाम सुनते ही मन मे भय व्याप्त हो जाता है , जबकि ऐसा नहीं है ... 
भैरव शिव के ही अंश हैं।

☸ माँ सती के अंग जहां जहां गिरे थे वे सभी शक्ति पीठ हो गए , भगवान शिव ने प्रत्येक शक्ति पीठ की रक्षा हेतु एक भैरव नियुक्त किया है। 

☸ धर्म ग्रंथों के अनुसार भैरव भी भगवान शंकर के ही अवतार हैं। 
भगवान शंकर के इस अवतार से हमे अवगुणों को त्यागना सीखना चाहिए।
☸ भैरव के बारे मे प्रचलित है कि ये अति क्रोधी, तामसिक गुणों वाले तथा मदिरा का सेवन करने वाले हैं। 
इस अवतार का मूल उद्देश्य है कि मनुष्य अपने सारे अवगुण जैसे- मदिरापान, तामसिक भोजन, क्रोधी स्वभाव आदि भैरव को समर्पित कर पूर्णत: धर्ममय आचरण करें।

भैरव अवतार से हमे यह भी शिक्षा मिलती है कि हर कार्य सोच विचार कर करना ही ठीक रहता है। 
बिना विचारे काम करने से पद व प्रतिष्ठा धूमिल होती है।

☸ शिव महापुराण मे भैरव को भगवान शंकर का पूर्ण रूप बताया है। 
इनके अवतार की कथा इस प्रकार है-
एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। 
इस विषय मे जब वेदों से पूछा गया तब उन्होंने शिव को सर्वश्रेष्ठ एवं परमतत्व कहा। किंतु ब्रह्मा व विष्णु ने उनकी बात का खंडन कर दिया। 
तभी वहां भगवान शंकर प्रकट हुए। 
उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा-
चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। 
अत: मेरी शरण में आओ। 
ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया। 
उनके क्रोध से वहां एक तेज-पुंज प्रकट हुआ और उसमे एक पुरुष दिखलाई पड़ा। 

भगवान शिव ने उस पुरुषाकृति से कहा-
काल की भांति शोभित होने के कारण तुम साक्षात कालराज हो। तुम से काल भी भयभीत रहेगा, अत: तुम कालभैरव भी हो। 
मुक्तिपुरी काशी का आधिपत्य तुमको सर्वदा प्राप्त रहेगा। 
उस नगरी के पापियों के शासक भी तुम ही होंगे। 
भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा का एक सिर काट दिया।

🌷
भगवान भैरवनाथ को प्रसन्न करने के उपाय-

☸ रविवार, बुधवार या गुरुवार के दिन एक रोटी लें। 
इस रोटी पर अपनी तर्जनी और मध्यमा अंगुली से तेल मे डुबोकर लाइन खींचें। 
यह रोटी किसी भी दो रंग वाले कुत्ते को खाने को दीजिए। 
यदि कुत्ता यह रोटी खा ले तो समझिए आपको भैरव नाथ का आशीर्वाद मिल गया। 
यदि कुत्ता रोटी सूंघ कर आगे बढ़ जाए तो इस क्रम को जारी रखें लेकिन सिर्फ हफ्ते के इन्हीं तीन दिनों में (रविवार, बुधवार या गुरुवार)। 
यही तीन दिन भैरव नाथ के माने गए हैं।
☸ उड़द के पकौड़े शनिवार की रात को सरसों के तेल मे बनाएं और रात भर उन्हें ढंककर रखें। 
सुबह जल्दी उठकर प्रात: 6 से 7 के बीच बिना किसी से कुछ बोले घर से निकले और रास्ते मे मिलने वाले पहले कुत्ते को खिलाएं। 
स्मरण रहे , पकौड़े डालने के बाद कुत्ते को पलट कर ना देखें। 
यह प्रयोग सिर्फ रविवार के लिए हैं।
☸ शनिवार के दिन शहर के किसी भी ऐसे भैरव नाथ जी का मंदिर खोजें जिन्हें लोगों ने पूजना लगभग छोड़ दिया हो। 
रविवार की सुबह सिंदूर, तेल, नारियल, पुए और जलेबी लेकर पहुंच जाएं। 
मन लगाकर उनकी पूजन करें। 
बाद में 5 से लेकर 7 साल तक के बटुकों यानी लड़कों को चने-चिरौंजी का प्रसाद बांट दें। 
साथ लाए जलेबी, नारियल, पुए आदि भी उन्हें बांटे। 

अपूज्य भैरव की पूजा से भैरवनाथ विशेष प्रसन्न होते हैं।
☸ प्रति गुरुवार कुत्ते को गुड़ खिलाएं।
☸ रेलवे स्टेशन पर जाकर किसी कोढ़ी, भिखारी को मदिरा की बोतल दान करें।
☸ सवा किलो जलेबी बुधवार के दिन भैरव नाथ को चढ़ाएं और कुत्तों को खिलाएं।
☸ शनिवार के दिन कड़वे तेल मे पापड़, पकौड़े, पुए जैसे विविध पकवान तलें और रविवार को गरीब बस्ती मे जाकर बांट दें।

☸ रविवार या शुक्रवार को किसी भी भैरव मं‍दिर मे गुलाब, चंदन और गुगल की खुशबूदार 33 अगरबत्ती जलाएं।
☸ पांच नींबू, पांच गुरुवार तक भैरव जी को चढ़ाएं।
☸ सवा सौ ग्राम काले तिल, सवा सौ ग्राम काले उड़द, सवा 11 रुपए, सवा मीटर काले कपड़े मे पोटली बनाकर भैरव नाथ के मंदिर मे बुधवार के दिन चढ़ाएं।

🌷
भैरव आराधना के लिए इनमे से कोई भी मंत्र ले सकते हैं - 

☸ - 'ॐ कालभैरवाय नम:।'

☸ - ॐ भयहरणं च भैरव:।'

☸ - 'ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।'

☸ - 'ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:।'

☸ - 'ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्‍।'

उपरोक्त मंत्र जप आपके समस्त शत्रुओं का नाश करके उन्हें भी आपके मित्र बना देंगे। 
आपके द्वारा सच्चे मन से की गई भैरव आराधना और मंत्र जप से आप स्वयं को जीवन मे संतुष्ट और शांति का अनुभव करेंगे।
भैरव की उपासना से साधक के व्यक्तित्व मे "वीरता" गुण का समावेश होता है।

!! ॐ सुरभ्यै नमः !! 
 आपका तिवारी परिवार

रविवार, 6 अक्टूबर 2019

लालच ही पतन का कारण बनता है

Image result for lalach


सत्य की ताकत..
एक दिन एक बहू ने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया  !!!
सफाई कर रही थी, मुंह में सुपारी थी..... पीक आया तो वेदी में थूक दिया पर उसे यह देखकरआश्चर्य हुआ कि उतना थूक तत्काल स्वर्ण में बदल गया है।
अब तो वह प्रतिदिन जान बूझकर वेदी में थूकने लगी। और उसके पास धीरे धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा।
महिलाओं में बात तेजी से फैलती है। कई और महिलाएं भी अपने अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक-थूक कर सोना उत्पादन करने लगी।
धीरे धीरे पूरे गांव में यह सामान्य चलन हो गया,
सिवाय एक महिला के...
उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया..... समझाया.....
“अरी..... तू क्यों नहीँ थूकती ?”
“महिला बोली..... जी बात यह है कि मै अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हरगिज नहीँ करूंगी और जहाँ तक मुझे ज्ञात है वे इसकी अनुमति कभी भी नहीँ देंगे।”
किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया..... कि आखिर उसने एक रात डरते डरते अपने ‎पति‬ को पूछ ही लिया।
“खबरदार जो ऐसा किया तो..... !! यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज है ?”
पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस वह महिला चुप हो गई.... पर जैसा वातावरण था और जो चर्चाएं होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी।
खास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियां अपने नए नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी।
पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते। वह सोचती थी कि -
“यह शायद मेरा दुर्भाग्य है..... अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप..... कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ता है।”
“शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है।”
“ओह  !!!  इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है ?”
“जिस नियम के पालन से ‎दिल‬ कष्ट पाता रहे। उसका पालन क्यों करूं ?”
...और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी। ‎
पतिदेव‬ इस रोग को ताड़ गए। उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया।
गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए। सूर्योदय से पहले पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे।
किन्तु.....
अरे   !!!  यह क्या..... ???
ज्यों ही वे गांव की कांकड़ (सीमा) से बाहर निकले।
पीछे भयानक विस्फोट हुआ।
पूरा गांव धू धू कर जल रहा था।
सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए
और उस स्त्री को अपने पति का महत्त्व समझ आ गया।
वास्तव में..... इतने दिन गांव बचा रहा, तो केवल इस कारण..... कि धर्म आचरण करने वाला उसका परिवार, गांव की परिधि में था।
*धर्माचरण करते रहे.....*
*कुछ पाने के लालच में इंसान बहुत कुछ खो बैठता है......इसलिए लालच से बचें.....*
*न जाने किसके भाग्य से आपका जीवन सुखमय व सुरक्षित है*
*परहित धर्म का भी पालन करते रहिए*
*क्योंकि...व्यक्तिगत स्वार्थ पतन का कारण बनता है..आप का तिवारी परिवार

सोमवार, 23 सितंबर 2019

घर मे पुजा करने की बीधी

Image result for pooja vidhi

घर पर पूजा-पाठ करने का क्या है सही विधि!!!!!!!
कोई भी शुभ काम शुरू करने से पहले या फिर किसी काम में सफलता प्राप्त करने के लिए सभी लोग अक्सर घर में पूजा पाठ करवाते हैं, ताकि उन्हें अपने लक्ष्य में सफलता मिल सके।
अपनी मनोकामना जल्दी पूरी हो सके, इसके लिए घर में पूजा-पाठ और मांगलिक उत्सव करने का सही तरीका इस प्रकार हैं :- और उसके लिए पूजा-पाठ करते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए..
*घर में पूजा-पाठ का सही स्थान क्या हो..??*
:
-घर में हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा में ही मंदिर का स्थान रखें।
-घर का मंदिर हमेशा लकड़ी का बना होना चाहिए।
-घर के मंदिर के आसपास कोई गंदगी न हो। उसे हमेशा साफ-सुथरा ही रखें।
*||*
*घर के मंदिर का मुख्य रंग क्या हो..??*
:
-मंदिर का सही रंग हल्का पीला या नारंगी होना चाहिए।
-घर के मंदिर में हमेशा हल्की पीली लाइट का प्रयोग करना चाहिए।
-मंदिर में गहरे नीले रंग का प्रयोग नहीं करें।
*||*
*घर के मंदिर में क्या-क्या रखना चाहिए..??*
:
-घर के मंदिर में हलके पीले रंग का या लाल रंग का वस्त्र बिछाएं।
-भगवान गणपति और महालक्ष्मी का स्वरूप रखें।
-अपने इष्ट और अपने कुल गुरु का चित्र अवश्य रखें।
-एक तांबे के लोटे में गंगाजल भरकर रखें।
*||*
*घर का मंदिर बनाते समय क्या-क्या सावधानी बरते..??*
:
-घर का मंदिर दक्षिण-पश्चिम दिशा में न बनाएं।
-मंदिर के आसपास कोई गंदगी न हो।
-मंदिर शौचालय के पास बिल्कुल न बनाएं।
-मंदिर के आसपास जूते-चप्पल कभी भी न रखें।
*||*
*कौन-सी दिशा में बैठकर भजन कीर्तन जाप किया जाए..??*
:
-हमेशा भजन कीर्तन पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह करके किया जाए तो सर्वोत्तम रहता है। अन्य किसी दिशा में किया गया भजन कीर्तन मन में उत्साह नहीं ला पाता।
-भजन कीर्तन करने से पहले भगवान मंगल मूर्ति के चित्र को हमेशा स्थापित करें उसके बाद ही भजन कीर्तन शुरू करें।
-जिस देवी-देवता का भजन किया जा रहा है उसके चित्र के सामने गाय के घी का दीपक और धूप अवश्य जलाएं व जल का पात्र भी रखें।
*||*
*भजन कीर्तन में बरतें ये सावधानियां..*
:
-भजन कीर्तन करते समय इधर-उधर की बातों में ध्यान न दें।
-हमेशा शुद्ध और साफ वस्त्र पहनकर ही भजन कीर्तन करें।
-भजन कीर्तन में शुद्ध मिठाई और साफ-सुथरे फलों का प्रयोग करें।
-हमेशा भजन कीर्तन में गाय के घी का दीपक और कलावे की बाती का प्रयोग करें।
*||*
*घर में पूजा पाठ और जाप का पूरा फल पाने के लिए करें उपाय..*
:
-घर में पूजा-पाठ करते समय श्वेत गुलाबी या हल्के पीले वस्त्र पहनकर ही पूजा करें।
-हमेशा लाल या पीले आसन पर बैठकर ही मंत्र जाप करें।
-जाप हमेशा लाल चंदन की माला या रुद्राक्ष की माला से करें।
-जाप शुरू करने से पहले भगवान गणपति व गुरु और अपने इष्ट का ध्यान करना चाहिए। उसके बाद ही जाप शुरू करें।
*||*
*सभी तरह की परेशानियों को दूर करने के उपाय..*
:
-घर में अकारण कलह रहती हो तो प्रतिदिन सुबह गायत्री मंत्र का 108 बार जाप करें।
-घर में यदि कोई बीमार रहता हो तो महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें और शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाएं।
-घर में धन की कमी हो तो श्री नारायण भगवान को पीले पुष्प चढ़ाएं।
-घर में नकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश को रोकने के लिए घर के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों की बंदनवार लगाएं..!!
जय श्री राम    आप का  तिवारी परिवार
जय श्री राम

होली प्रबल होती है

*होनी बहुत बलवान है* अभिमन्यु के पुत्र ,राजा परीक्षित थे |  राजा परीक्षित के बाद उन के लड़के जनमेजय राजा बने | एक दिन जनमेजय वेदव्यास जी के ...