शनिवार, 12 सितंबर 2020

हमारी सारी पुन्ने नष्ट तब हो जाता जब हम पाप देखते रहते है

प्रसंग (बोध कथा)

 श्री कृष्ण महाभारत के युद्ध पश्चात् लौटे तो रोष में भरी रुक्मिणी ने उनसे पूछा ?
 " बाकी सब तो ठीक था किंतु आपने द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जैसे धर्मपरायण लोगों के वध में क्यों साथ दिया ?"
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श्री कृष्ण ने उत्तर दिया -
"ये सही है की उन दोनों ने जीवन पर्यंत धर्म का पालन किया किन्तु उनके किये एक पाप ने उनके सारे पुण्यों को हर लिया "

    *"वो कौनसे पाप थे?"*

श्री कृष्ण ने कहा :
 "जब भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था तब ये दोनों भी वहां उपस्थित थे,और बड़े होने के नाते ये दुशासन को आज्ञा भी दे सकते थे किंतु इन्होंने ऐसा नहीं किया

    *उनका इस एक पाप से बाकी,*
  *सारी धर्मनिष्ठता छोटी पड गई"*
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रुक्मिणी ने पुछा -
"और कर्ण? 
वो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था,कोई उसके द्वार से खाली हाथ नहीं गया उसकी क्या गलती थी?"

श्री कृष्ण ने कहा, "वस्तुतः वो अपनी दानवीरता के लिए विख्यात था और उसने कभी किसी को ना नहीं कहा,

 किन्तु जब अभिमन्यु सभी युद्धवीरों को धूल चटाने के बाद युद्धक्षेत्र में आहत हुआ भूमि पर पड़ा था तो उसने कर्ण से,जो उसके पास खड़ा था,पानी माँगा,कर्ण जहाँ खड़ा था उसके पास पानी का एक गड्ढा था किंतु कर्ण ने मरते हुए अभिमन्यु को पानी नहीं दिया।

इसलिये उसका जीवन भर दानवीरता से कमाया हुआ पुण्य नष्ट हो गया। बाद में उसी गड्ढे में उसके रथ का पहिया फंस गया और वो मारा गया" 

प्रायः ऐसा होता है की हमारे आसपास कुछ गलत हो रहा होता है और हम कुछ नहीं करते । हम सोचते हैं की इस पाप के भागी हम नहीं हैं किंतु मदद करने की स्थिति में होते हुए भी कुछ ना करने से हम उस पाप के उतने ही हिस्सेदार हो जाते हैं ।
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किसी स्त्री, बुजुर्ग, निर्दोष,कमज़ोर या बच्चे पर अत्याचार होते देखना और कुछ ना करना हमें पाप का भागी बनाता है। सड़क पर दुर्घटना में घायल हुए व्यक्ति को लोग नहीं उठाते हैं क्योंकि वो समझते है की वो पुलिस के चक्कर में फंस जाएंगे|

*आपके अधर्म का एक क्षण सारे जीवन के कमाये धर्म को नष्ट कर सकता है।*।

🌹🙏मंगल सुप्रभात🙏🌹

🌹🙏जय जय श्री राधे🙏🌹

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आप का तिवारी परिवार जय श्री राधे राधे 

शनिवार, 29 अगस्त 2020

हमारी संस्कृति पर शीधा प्रहार कर रहे हैं बामपंथी और मिशनरियों के धोवारा

किसी निष्कर्ष पर पहुचने से पहले पूरा पढ़ें...

#वेशभूषा" और "#पहनावे" से कुछ नहीं होता!
एक दिन मोहल्ले में किसी ख़ास अवसर पर महिला सभा का आयोजन किया गया, सभा स्थल पर महिलाओं की संख्या अधिक और पुरुषों की कम थी। मंच पर तकरीबन पच्चीस वर्षीय खुबसूरत युवती, आधुनिक वस्त्रों से सुसज्जित, माइक थामें कोस रही थी पुरुष समाज को।

वही पुराना आलाप.... कम और छोटे कपड़ों को जायज, और कुछ भी पहनने की स्वतंत्रता का बचाव करते हुए, पुरुषों की गन्दी सोच और खोटी नीयत का दोष बतला रही थी।

तभी अचानक सभा स्थल से... तीस बत्तीस वर्षीय सभ्य, शालीन और आकर्षक से दिखते नवयुवक ने खड़े होकर अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति मांगी। अनुमति स्वीकार कर अनुरोध माइक उसके हाथों मे सौप दिया गया .... हाथों में माइक आते ही उसने बोलना  शुरु किया....

"माताओं, बहनों और भाइयों, मैं आप सबको नही जानता और आप सभी मुझे नहीं जानते कि आखिर मैं कैसा इंसान हूं? लेकिन पहनावे और शक्ल सूरत से मैं आपको कैसा लगता हूँ बदमाश या शरीफ?"

सभास्थल से कई आवाजें गूंज उठीं... पहनावे और बातचीत से तो आप शरीफ लग रहे हो... शरीफ लग रहे हो... शरीफ लग रहे हो....

बस यहि सुनकर, अचानक ही उसने अजीबोगरीब हरकत कर डाली... सिर्फ हाफ पैंट टाइप की अपनी  अंडरवियर छोड़ कर के बांकि सारे कपड़े मंच पर ही उतार दिये। ये देख कर .... पूरा सभा स्थल आक्रोश से गूंज उठा, मारो मारो गुंडा है, बदमाश है, बेशर्म है, शर्म नाम की चीज नहीं है इसमें.... मां बहन का लिहाज नहीं है इसको, नीच इंसान है, ये छोड़ना मत इसको....

ये आक्रोशित शोर सुनकर... अचानक वो माइक पर गरज उठा... 

"रुको... पहले मेरी बात सुन लो, फिर मार भी लेना चाहे तो जिंदा जला भी देना मुझको। अभी अभी तो....ये बहन जी कम कपड़े , तंग और बदन नुमाया छोटे छोटे कपड़ों की पक्ष के साथ साथ स्वतंत्रता की दुहाई देकर गुहार लगाकर...

"नीयत और सोच में खोट" बतला रही थी... तब तो आप सभी तालियां बजा-बजाकर सहमति जतला रहे थे। फिर मैंने क्या किया है? सिर्फ कपड़ों की स्वतंत्रता ही तो दिखलायी है।
"नीयत और सोच" की खोट तो नहीं ना और फिर मैने तो, आप लोगों को... मां बहन और भाई भी कहकर ही संबोधित किया था। फिर मेरे अर्द्ध नग्न होते ही.... आप में से किसी को भी मुझमें "भाई और बेटा" क्यों नहीं नजर आया?? मेरी नीयत में आप लोगों को खोट कैसे नजर आ गया? मुझमें आपको सिर्फ "मर्द" ही क्यों नजर आया? भाई, बेटा, दोस्त क्यों नहीं नजर आया? आप में से तो किसी की "सोच और नीयत" भी खोटी नहीं थी... फिर ऐसा क्यों?? "

सच तो यही है कि..... झूठ बोलते हैं लोग कि... 
"वेशभूषा" और "पहनावे" से कोई फर्क नहीं पड़ता

हकीकत तो यही है कि मानवीय स्वभाव है कि किसी को सरेआम बिना "आवरण" के देखे लें तो कामुकता जागती है मन में...
रूप, रस, शब्द, गन्ध, स्पर्श ये बहुत प्रभावशाली कारक हैं  इनके प्रभाव से विस्वामित्र जैसे मुनि के मस्तिष्क में विकार पैदा हो गया था। जबकि उन्हें सिर्फ रूप कारक के दर्शन किये! आम मनुष्यों की विसात कहाँ।

दुर्गा शप्तशती के देव्या कवच में श्लोक 38 में भगवती से इन्हीं कारकों से रक्षा करने की प्रार्थना की गई।
#रसे_रुपे_च_गन्धे_च_शब्दे_स्पर्शे_च_योगिनी।
#सत्त्वं_रजस्तमश्चैव_रक्षेन्नारायणी_सदा।।
रस रूप गंध शब्द स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करें तथा सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें।

अब बताइए, हम भारतीय हिन्दु महिलाओं को "हिन्दु संस्कार" में रहने को समझाएं तो स्त्रियों की कौन-सी "स्वतंत्रता" छीन रहे हैं???

संभालिए अपने आप और समाज को, क्योंकि भारतीय समाज और संस्कृति का आधार नारीशक्ति है और धर्म विरोधी, अधर्मी, चांडाल (बॉलीवुड, वामपंथी, इसे मिशनरी) ये हमारे समाज के आधार को तोड़ने का षड्यंत्र कर रहे हैं 🙏🙏🙏 
आप का तिवारी परिवारा 
जय श्री राधे राधे 
धन्यवाद 

रविवार, 9 अगस्त 2020

असकंद पुराण का एक इस्लोक ने वैज्ञानिक को चैलेंज करता है जो आज तर्क हितकर करते हैं

मैं जो कहने जा रही  हूँ इसको ज़रा ध्यान से पढ़ियेगा। विश्वास है आप प्रभावित अवश्य होंगे। 
ऋग्वेद में एक श्लोक है जिसपर व्याख्या करते हुए कहा गया है : 
"तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धे- न क्रममाण नमोऽस्तुते- ॥"
अर्थात "हे सूर्यदेव, आप आधे निमेष में 2,202 योजन की यात्रा करते हैं, आपको नमन।"
2,202 योजन 3,18,94,042.81 मीटर के बराबर होता है। 
एक निमेष 16/75 सेकण्ड के बराबर होता है। 
इस श्लोक के अनुसार सूर्य के प्रकाश की गति निकलती है 2.9907 X 10^8 मीटर प्रति सेकण्ड। 
हमारे आधुनिक वैज्ञानिकों ने प्रकाश की गति निकली है जो है 2.9979 X 10^8 मीटर प्रति सेकण्ड। 
3500 साल पहले भारत के वैज्ञानिक प्रकाश की गति खोज चुके थे और यह सब हमारे ग्रंथों में अभिलिखित है। भारत की ज्ञाननिधि असीम है और इसे अभिलिखित किया गया था विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा में - संस्कृत में। 
क्या हमें संस्कृत सीखनी चाहिए? यदि भारत की महानता एक खजाना है तो उसकी चाबी संस्कृत है। हमारे ऊपर हमारे महान पूर्वजों और आने वाली पीढ़ियों का ऋण है कि हम संस्कृत सीखें और सिखाएं।
धन्यवाद आप का तिवारी परिवार जय श्री राधे राधे 

बुधवार, 22 जुलाई 2020

बिजली बिभाग कुछ इस तरह का भाव है

बिजली विभाग के दफ्तर के बाहर राजू केले बेच रहा था।

बिजली विभाग के एक बड़े अधिकारी ने पूछा : " केले कैसे दिए" ?

राजू: केले किस लिए खरीद रहे हैं साहब ?

अधिकारी:- मतलब ?? 

राजू:- मतलब ये साहब कि,
मंदिर के प्रसाद के लिए ले रहे हैं तो 10 रुपए दर्जन। 
वृद्धाश्रम में देने हों तो 15 रुपए दर्जन। 
बच्चों के टिफिन में रखने हों तो 20 रुपए दर्जन। 
घर में खाने के लिए ले जा रहे हों तो, 25 रुपए दर्जन 
और अगर  पिकनिक के लिए खरीद रहे हों तो 30 रुपए दर्जन।

अधिकारी: - ये क्या बेवकूफी है ? अरे भई, जब सारे केले एक जैसे ही हैं तो,भाव अलग अलग क्यों बता रहे हो ?

राजू: - ये तो पैसे वसूली का, आप ही का स्टाइल है साहब। 
1 से 100 रीडिंग का रेट अलग, 
100 से 200 का अलग, 
200 से 300 का अलग। 

अरे आपके बाप की बिजली है क्या ?

आप भी तो एक ही खंभे से बिजली देते हो। 

तो फिर घर के लिए अलग रेट, 
दूकान के लिए अलग रेट, 
कारखाने के लिए अलग रेट, 

फिर इंधन भार, विज आकार.....

और हाँ, एक बात और साहब, 
मीटर का भाड़ा।

मीटर क्या अमेरिका से आयात किया है ? 25 सालों से उसका भाड़ा भर रहा हूँ। आखिर उसकी कीमत है कितनी ?? आप ये तो बता दो मुझे एक बार।

जागो ग्राहक जागो
🎺   अगर आपको अच्छी लगे तो आगे सेयर करना  😊👍🏼

सोमवार, 13 जुलाई 2020

संगत का असर इस तरह होता है

(((( संगत का प्रभाव ))))
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एक राजा का तोता मर गया। उन्होंने कहा-- मंत्रीप्रवर! हमारा पिंजरा सूना हो गया। इसमें पालने के लिए एक तोता लाओ।
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तोते सदैव तो मिलते नहीं। राजा पीछे पड़ गये तो मंत्री एक संत के पास गये और कहा-- भगवन्! राजा साहब एक तोता लाने की जिद कर रहे हैं। आप अपना तोता दे दें तो बड़ी कृपा होगी। संत ने कहा- ठीक है, ले जाओ।
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राजा ने सोने के पिंजरे में बड़े स्नेह से तोते की सुख-सुविधा का प्रबन्ध किया।
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ब्रह्ममुहूर्त में तोता बोलने लगा--  जय श्री राम ,,,   ओम् तत्सत्....ओम् तत्सत् ... उठो राजा! उठो महारानी! दुर्लभ मानव-तन मिला है। यह सोने के लिए नहीं, भजन करने के लिए मिला है।
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'चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसै तिलक देत रघुबीर।।'
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कभी रामायण की चौपाई तो कभी गीता के श्लोक उसके मुँह से निकलते। पूरा राजपरिवार बड़े सवेरे उठकर उसकी बातें सुना करता था। राजा कहते थे कि सुग्गा क्या मिला, एक संत मिल गये।
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हर जीव की एक निश्चित आयु होती है। एक दिन वह सुग्गा मर गया। राजा, रानी, राजपरिवार और पूरे राष्ट्र ने हफ़्तों शोक मनाया। झण्डा झुका दिया गया।
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किसी प्रकार राजपरिवार ने शोक संवरण किया और राजकाज में लग गये। पुनः राजा साहब ने कहा-- मंत्रीवर ! खाली पिंजरा सूना-सूना लगता है, एक तोते की व्यवस्था हो जाती!
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मंत्री ने इधर-उधर देखा, एक कसाई के यहाँ वैसा ही तोता एक पिंजरे में टँगा था। मंत्री ने कहा कि इसे राजा साहब चाहते हैं।
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कसाई ने कहा कि आपके राज्य में ही तो हम रहते हैं। हम नहीं देंगे तब भी आप उठा ही ले जायेंगे।
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मंत्री ने कहा-- नहीं, हम तो प्रार्थना करेंगे।
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कसाई ने बताया कि किसी बहेलिये ने एक वृक्ष से दो सुग्गे पकड़े थे। एक को उसने महात्माजी को दे दिया था और दूसरा मैंने खरीद लिया था। राजा को चाहिये तो आप ले जायँ।
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अब कसाईवाला तोता राजा के पिंजरे में पहुँच गया।
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राजपरिवार बहुत प्रसन्न हुआ। सबको लगा कि वही तोता जीवित होकर चला आया है।
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दोनों की नासिका, पंख, आकार, चितवन सब एक जैसे थे। लेकिन बड़े सवेरे तोता उसी प्रकार राजा को बुलाने लगा जैसे वह कसाई अपने नौकरों को उठाता था कि..
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उठ ! हरामी के बच्चे! राजा बन बैठा है। मेरे लिए ला अण्डे, नहीं तो पड़ेंगे डण्डे!
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राजा को इतना क्रोध आया कि उसने तोते को पिंजरे से निकाला और गर्दन मरोड़कर किले से बाहर फेंक दिया।
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दोनों सुग्गे, सगे भाई थे। एक की गर्दन मरोड़ दी गयी, तो दूसरे के लिए झण्डे झुक गये, भण्डारा किया गया, शोक मनाया गया।
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आखिर भूल कहाँ हो गयी ? अन्तर था तो संगति का ! सत्संग की कमी थी।
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'संगत ही गुण होत है, संगत ही गुण जाय।
बाँस फाँस अरु मीसरी, एकै भाव बिकाय।।'
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सत्य क्या है और असत्य क्या है ? उस सत्य की संगति कैसे करें ?
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पूरा सद्गुरु ना मिला, मिली न साँची सीख।
भेष जती का बनाय के, घर-घर माँगे भीख।

****जय श्री राम , जय महावीर हनुमान ****
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मनुष्य योनि का महत्व ,,,,,,,,

*नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥
नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥
भावार्थ:-मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है॥
* सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥
काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं॥

भावार्थ:-ऐसे मनुष्य शरीर को धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं॥
 
आप का तिवारी परिवार 

बुधवार, 27 मई 2020

भगवान् पसूपती नाथ की कुछ महिमा

🐍🔱#जय_पशुपतिनाथ_महादेव।🔱🐍
          **पौराणिक कथा**
🎱1. एक पौराणिक कथा के अनुसार #भगवान #शिव यहां पर #चिंकारे का #रूप धारण कर #निद्रा में चले बैठे थे। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहा जाता हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया था। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में यहां प्रकट हुए थे।

 🎱2.दूसरी कथा एक चरवाहे से जुड़ी है। कहते हैं कि इस शिवलिंग को एक चरवाहे द्वारा खोजा गया था जिसकी गाय का अपने दूध से अभिषेक कर शिवलिंग के स्थान का पता लगाया था।
 
🎱 3.तीसरी कथा भारत के उत्तराखंड राज्य से जुडी एक पौराणिक कथा से है। इस कथा के अनुसार इस मंदिर का संबंध केदारनाथ मंदिर से है। कहा जाता है जब पांडवों को स्वर्गप्रयाण के समय शिवजी ने भैंसे के स्वरूप में दर्शन दिए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन पूर्णतः समाने से पूर्व भीम ने उनकी पुंछ पकड़ ली थी। जिस स्थान पर भीम ने इस कार्य को किया था उसे वर्तमान में केदारनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। एवं जिस स्थान पर उनका मुख धरती से बाहर आया उसे पशुपतिनाथ कहा जाता है। पुराणों में पंचकेदार की कथा नाम से इस कथा का विस्तार से उल्लेख मिलता है।

शुक्रवार, 8 मई 2020

राजा जनक के बाद मिथिला का उत्तर अधिकारी के नाम इस प्रकार है

रामायण काल तक के विदेह (जनक) वंशीय राजाओं के नाम वाल्मीकीय रामायण में स्पष्टतया उल्लिखित रहने के कारण पुराणों की अपेक्षा वे नाम ही स्वीकार्य हैं, परन्तु सीरध्वज जनक के बाद के राजाओं के नाम स्वाभाविक रूप से वाल्मीकीय रामायण में न होने के कारण पुराणों का सहारा लेना पड़ता है। इनमें सर्वाधिक प्राचीन पुराणों में से एक तथा अपेक्षाकृत सुसंगत श्रीविष्णुपुराण का आधार अधिक उपयुक्त है। सीरध्वज के पुत्र भानुमान् से लेकर कृति (अन्तिम) तक कुल 32 राजाओं के नाम श्रीविष्णुपुराण[4] में दिये गये हैं और उन्हें स्पष्ट रूप से 'मैथिल' (इत्येते मैथिला:) कहा गया है।

1.भानुमान्

2.शतद्युम्न

3.शुचि

4.ऊर्जनामा

5.शतध्वज

6.कृति

7.अंजन

8.कुरुजित्

9.अरिष्टनेमि

10.श्रुतायु

11.सुपार्श्व

12.सृंजय

13.क्षेमावी

14.अनेना

15.भौमरथ

16.सत्यरथ

17.उपगु

18.उपगुप्त

19.स्वागत

20.स्वानन्द

21.सुवर्चा

22.सुपार्श्व

23.सुभाष

24.सुश्रुत

25.जय

26.विजय

27.ऋत

28.सुनय

29.वीतहव्य

30.धृति

31.बहुलाश्व

32.कृति

इस अन्तिम राजा कृति के साथ ही जनकवंश की समाप्ति मानी गयी है। इसे ही अन्यत्र 'कराल जनक' भी कहा गया है।[5] यहाँ परिगणित तेरहवें राजा क्षेमावी का अपर नाम कुछ लोगों ने 'क्षेमारि' भी माना है तथा महाभारतकालीन राजा क्षेमधूर्ति से उसकी समानता की बात कही है।[।आप का  तिवारी परिवार जय श्री राम 


रविवार, 26 अप्रैल 2020

लोकडाउन के दौरान महाभारत कुछ न्याय पूण्य बात

लोकडाउन के समय ज्ञान वर्धन हेतु ____________________________

बहुत सारे मित्रों ने कहा कि महाभारत के चीर-हरण प्रसङ्ग पर लिखिये।
     मुझे लगता है महाभारत एक पूर्ण न्यायशास्त्र है, और चीर-हरण उसका केन्द्रबिन्दु! इस प्रसङ्ग के बाद की पूरी कथा इस घिनौने अपराध के अपराधियों को मिले दण्ड की कथा है। वह दण्ड, जिसे निर्धारित किया भगवान श्रीकृष्ण ने और किसी को नहीं छोड़ा... किसी को भी नहीं।
    दुर्योधन ने उस अबला स्त्री को दिखा कर अपनी जंघा ठोकी थी, तो उसकी जंघा तोड़ी गयी। दुशासन ने छाती ठोकी तो उसकी छाती फाड़ दी गयी। महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया।
     भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखे... भारत का कोई बुजुर्ग अपने सामने अपने बच्चों को मरते देखना नहीं चाहता, पर भीष्म अपने सामने चार पीढ़ियों को मरते देखते रहे। जबतक सब देख नहीं लिया, तबतक मर भी न सके... यही उनका दण्ड था।  
     धृतराष्ट्र का दोष था पुत्रमोह, तो सौ पुत्रों के शव को कंधा देने का दण्ड मिला उन्हें। सौ हाथियों के बराबर बल वाला धृतराष्ट्र सिवाय रोने के और कुछ नहीं कर सका।
     दण्ड केवल कौरव दल को ही नहीं मिला था। दण्ड पांडवों को भी मिला। द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाली थी, सो उनकी रक्षा का दायित्व सबसे अधिक अर्जुन पर था। अर्जुन यदि चुपचाप उनका अपमान देखते रहे, तो सबसे कठोर दण्ड भी उन्ही को मिला। अर्जुन पितामह भीष्म को सबसे अधिक प्रेम करते थे, तो कृष्ण ने उन्ही के हाथों पितामह को निर्मम मृत्यु दिलाई। अर्जुन रोते रहे, पर तीर चलाते रहे... क्या लगता है, अपने ही हाथों अपने अभिभावकों, भाइयों की हत्या करने की ग्लानि से अर्जुन कभी मुक्त हुए होंगे क्या? नहीं... वे जीवन भर तड़पे होंगे। यही उनका दण्ड था।
    युधिष्ठिर ने स्त्री को दाव पर लगाया, तो उन्हें भी दण्ड मिला। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ने वाले युधिष्ठिर ने युद्धभूमि में झूठ बोला, और उसी झूठ के कारण उनके गुरु की हत्या हुई। यह एक झूठ उनके सारे सत्यों पर भारी रहा... धर्मराज के लिए इससे बड़ा दण्ड क्या होगा?
     दुर्योधन को गदायुद्ध सिखाया था स्वयं बलराम ने। एक अधर्मी को गदायुद्ध की शिक्षा देने का दण्ड बलराम को भी मिला। उनके सामने उनके प्रिय दुर्योधन का वध हुआ और वे चाह कर भी कुछ न कर सके... 
     उस युग में दो योद्धा ऐसे थे जो अकेले सबको दण्ड दे सकते थे, कृष्ण और बर्बरीक। पर कृष्ण ने ऐसे कुकर्मियों के विरुद्ध शस्त्र उठाने तक से इनकार कर दिया, और बर्बरीक को युद्ध मे उतरने से ही रोक दिया। लोग पूछते हैं कि बर्बरीक का वध क्यों हुआ? यदि बर्बरीक का बध नहीं हुआ होता तो द्रौपदी के अपराधियों को यथोचित दण्ड नहीं मिल पाता। कृष्ण युद्धभूमि में विजय और पराजय तय करने के लिए नहीं उतरे थे, कृष्ण कृष्णा के अपराधियों को दण्ड दिलाने उतरे थे।
     कुछ लोगों ने कर्ण का बड़ा महिमामण्डन किया है। पर सुनिए! कर्ण कितना भी बड़ा योद्धा क्यों न रहा हो, कितना भी बड़ा दानी क्यों न रहा हो, एक स्त्री के वस्त्र-हरण में सहयोग का पाप इतना बड़ा है कि उसके समक्ष सारे पुण्य छोटे पड़ जाएंगे। द्रौपदी के अपमान में किये गए सहयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि वह महानीच व्यक्ति था, और उसका वध ही धर्म था।
     स्त्री कोई वस्तु नहीं कि उसे दाव पर लगाया जाय। कृष्ण के युग में दो स्त्रियों को बाल से पकड़ कर घसीटा गया। देवकी का बाल पकड़ा कंस ने, और द्रौपदी का बाल पकड़ा दुशासन ने। श्रीकृष्ण ने स्वयं दोनों के अपराधियों का समूल नाश किया। किसी स्त्री के अपमान का दण्ड  अपराधी के समूल नाश से ही पूरा होता है, भले वह अपराधी विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ही क्यों न हो... यही न्याय है, यही धर्म है। और इस धर्म को स्थापित करने वाला भारत है, सनातन है...
आप का धन्यवाद 
आप का तिवारी परिवार  जय श्री राधे 

रविवार, 19 अप्रैल 2020

राम के नाम ने कैसे बचाई जान

एक आदमी ❄बर्फ बनाने वाली कम्पनी में काम करता था___
एक दिन कारखाना बन्द होने से पहले अकेला फ्रिज करने वाले कमरे का चक्कर लगाने गया तो गलती से दरवाजा बंद हो गया
और वह अंदर बर्फ वाले हिस्से में फंस गया..
छुट्टी का वक़्त था और सब काम करने वाले लोग घर जा रहे थे
किसी ने भी अधिक ध्यान नहीं दिया की कोई अंदर फंस गया है।
वह समझ गया की दो-तीन घंटे बाद उसका शरीर बर्फ बन जाएगा अब जब मौत सामने नजर आने लगी तो
भगवान को सच्चे मन से याद करने लगा।
अपने कर्मों की क्षमा मांगने लगा और भगवान से कहा कि 
प्रभु अगर मैंने जिंदगी में कोई एक काम भी मानवता व धर्म का किया है तो तूम मुझे यहाँ से बाहर निकालो।
मेरे बीवी बच्चे मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। उनका पेट पालने वाला इस दुनिया में सिर्फ मैं ही हूँ।
मैं पुरे जीवन आपके इस उपकार को याद रखूंगा और इतना कहते कहते उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।
एक घंटे ही गुजरे थे कि अचानक फ़्रीजर रूम में खट खट की आवाज हुई।
दरवाजा खुला चौकीदार भागता हुआ आया।
उस आदमी को उठाकर बाहर निकाला और 🔥 गर्म हीटर के पास ले गया।
उसकी हालत कुछ देर बाद ठीक हुई तो उसने चौकीदार से पूछा, आप अंदर कैसे आए ?
चौकीदार बोला कि साहब मैं 20 साल से यहां काम कर रहा हूं। इस कारखाने में काम करते हुए हर रोज सैकड़ों मजदूर और ऑफिसर कारखाने में आते जाते हैं।
मैं देखता हूं लेकिन आप उन कुछ लोगों में से हो, जो जब भी कारखाने में आते हो तो मुझसे हंस कर 
*राम राम* करते हो
और हालचाल पूछते हो और निकलते हुए आपका 
*राम राम काका*
कहना मेरी सारे दिन की थकावट दूर कर देता है।
जबकि अक्सर लोग मेरे पास से यूं गुजर जाते हैं कि जैसे मैं हूं ही नहीं।
आज हर दिनों की तरह मैंने आपका आते हुए अभिवादन तो सुना लेकिन 
*राम राम काका* 
सुनने के लिए इंतज़ार 
करता रहा।
जब ज्यादा देर हो गई तो मैं आपको तलाश करने चल पड़ा कि कहीं आप किसी मुश्किल में ना फंसे हो।
वह आदमी हैरान हो गया कि किसी को हंसकर
*राम राम* कहने जैसे छोटे काम की वजह से आज उसकी जान बच गई।
*राम कहने से तर जाओगे*
मीठे बोल बोलो, 
संवर जाओगे,
सब की अपनी जिंदगी है 
यहाँ कोई किसी का नही खाता है।
जो दोगे औरों को,
वही वापस लौट कर आता है।
 तो बोलो जय श्रीराम राम  ।
आप का तिवारी परिवार जय हिंद 
जय श्री राम 

लंका से हनुमान जी को शुमेरू परबत से संजीवनी बूटी को लेकर आने कितना समय लगा

#हनुमानजी की उड़ने की गति कितनी थी 
#जानिए हनुमानजी की उड़ने की गति कितनी रही होगी उसका अंदाजा आप लगा सकते हैं की रात्रि को 9:00 बजे से लेकर 12:00 बजे तक #लक्ष्मण जी एवं #मेघनाद का युद्ध हुआ था। मेघनाद द्वारा चलाए गए बाण से#लक्ष्मण जी को शक्ति लगी थी लगभग रात को 12:00 बजे के करीब  और वो #मूर्छित हो गए थे।

#रामजी को लक्ष्मण जी मूर्छा की जानकारी मिलना फिर दुखी होने के बाद चर्चा जे उपरांत हनुमान जी & विभीषणजी के कहने से #सुषेण वैद्य को #लंका से लेकर आए होंगे 1 घंटे में अर्थात 1:00 बजे के करीबन।

सुषेण वैद्य ने जांच करके बताया होगा कि #हिमालय के पास #द्रोणागिरी पर्वत पर यह चार #औषधियां मिलेगी जिन्हें उन्हें #सूर्योदय से पूर्व 5:00 बजे से पहले लेकर आना था ।इसके लिए #रात्रि को 1:30 बजे हनुमान जी हिमालय के लिए रवाना हुए होंगे।

हनुमानजी को ढाई हजार किलोमीटर दूर हिमालय के द्रोणगिरि पर्वत से उस औषधि को लेकर आने के लिए  3:30 घंटे का समय मिला था। इसमें भी उनका आधे घंटे का समय औषधि खोजने में लगा होगा ।आधे घंटे का समय #कालनेमि नामक राक्षस ने जो उनको भ्रमित किया उसमें लगा होगा एवं आधे घंटे का समय #भरत जी के द्वारा उनको नीचे गिराने में तथा वापस भेजने देने में लगा होगा।अर्थात आने जाने के लिये मात्र दो घण्टे का समय मिला था।

मात्र  दो  घंटे में हनुमान जी द्रोणगिरी पर्वत हिमालय पर जाकर वापस 5000 किलोमीटर की यात्रा करके आये थे, अर्थात उनकी गति ढाई हजार किलोमीटर प्रति घंटा रही होगी।

आज का नवीनतम #मिराज #वायुयान  की गति 2400 किलोमीटर प्रति घंटा है ,तो हनुमान जी महाराज उससे भी तीव्र गति से जाकर मार्ग के तीन-तीन अवरोधों को दूर करके वापस सूर्योदय से पहले आए ।यह उनकी विलक्षण #शक्तियों के कारण संभव हुआ था।
बोलिए हनुमान जी महाराज की जय
#पवनसुत हनुमान की जय 
#सियावर रामचंद्र जी की जय
🙏🙏जय श्री राम जय हनुमान 
आप का तिवारी परिवार जय हिंद 

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

आवो सब मिलकर सतयुग का आभार व्यक्त करते हूँ

लगता है कलयुग समाप्त हो गया और सतयुग आ गया है।

 पूजा,व्रत उपवास,हवन,मैना सुंदरी, भक्तामर कथा,रामायण, महाभारत।
प्रदूषण रहित वातावरण।
भाग -दौड़ भरी जिंदगी समाप्त।
सादगी भरा सबका जीवन - सब दाल-रोटी खा रहे हैं।
समानता आ गयी है, कोई नौकर नहीं,घर में सब मिल जुलकर काम कर लेते हैं।
न कोई महँगे कपड़े पहन रहा है न कोई आभूषण धारण कर रहा है।
सब 24 घण्टे ईश्वर को ही याद कर रहे हैं।
लोग अपार दान धर्म कर रहे हैं।
सबका अहंकार शान्त हो गया है।
लोग परस्पर सहयोग कर रहे हैं।
सब बच्चे बाहर से आकर माँ बाप के पास रहने लगे हैं।
घर घर भजन कीर्तन हो रहे हैं।
ये सतयुग नहीं तो और क्या है ?

🤷‍♂️
वातावरण बिल्कुल शांत है , 
पैसे की जरूरत नही 
3 टाइम खा रहे है  और अगर ऐसा ही रहा तो कपड़ों की जरूरत भी नही रहेगी 
पुराने कपड़ों में ही पूरा साल निकल जायेगा....
वातावरण इतना साफ की कार्बन डाइऑक्साइड का नामो निशान नही और साफ ऑक्सीजन ही लेंगे तो बीमार भी नही पड़ेंगे , 
मृत्युदर तो ना के बराबर कोरोना से मरे तो मरे बाकी एक्सीडेंट से कोई नही मरेगा , 
सारे झगड़े फसाद खतम 
न कोई प्रेम का चक्कर,
 न किसी को किसी पर शक, 
न शॉपिंग का चक्कर,
 न होटल या मूवी की फरमाइश......
न घूमने जाने की जरूरत....
न नई साड़ी की डिमांड 
न ज्वैलरी खरीदने की जिद्द सब कुछ ठीक ही चल रहा है
सही कहते थे लोग की राम राज आयेगा
सच मे रामराज आ गया है...
बीप्र धेनू शूर संत हीत  लीन मनुज औतार निज इच्छा निमित्त तन माया गुन गोपाल 
जय श्री राम 
आप का तिवारी परिवार जय हिंद 

होली प्रबल होती है

*होनी बहुत बलवान है* अभिमन्यु के पुत्र ,राजा परीक्षित थे |  राजा परीक्षित के बाद उन के लड़के जनमेजय राजा बने | एक दिन जनमेजय वेदव्यास जी के ...